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ग्रैंड विजन और केबल ऑपरेटर के बीच एक करोड़ का विवाद सुलझाने के लिए हाईकोर्ट ने नियुक्त किया मध्यस्थ

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने ग्रैंड विजन और केबल ऑपरेटर अशोक शर्मा के मध्य जारी एक करोड़ के लेन-देन विवाद को सुलझाने के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा को मध्यस्थ बनाया है। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने अनुबंध की शर्तों और दोनों पक्षों की रजामंदी के बाद यह आदेश पारित किया। अब नियुक्त आर्बिट्रेटर इ

📅 23 September 2026, 4:05 am प्रकाशित: 23 September 2026
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ग्रैंड विजन और केबल ऑपरेटर के बीच एक करोड़ का विवाद सुलझाने के लिए हाईकोर्ट ने नियुक्त किया मध्यस्थ

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने ग्रैंड विजन और केबल ऑपरेटर अशोक शर्मा के मध्य जारी एक करोड़ के लेन-देन विवाद को सुलझाने के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा को मध्यस्थ बनाया है। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने अनुबंध की शर्तों और दोनों पक्षों की रजामंदी के बाद यह आदेश पारित किया। अब नियुक्त आर्बिट्रेटर इस व्यापारिक मतभेद पर विस्तृत सुनवाई कर न्यायोचित निर्णय लेंगे।

इस पूरे विवाद की जड़ें 30 जनवरी 2023 को हुए एक द्विपक्षीय समझौते में निहित हैं। आवेदक गुरुचरण सिंह होरा और प्रतिवादी अशोक कुमार शर्मा के बीच हुए इस व्यावसायिक अनुबंध में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि भविष्य में यदि किसी भी प्रकार का विवाद या असहमति उत्पन्न होती है, तो उसे क्लॉज 6.3 के तहत आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) के माध्यम से हल किया जाएगा। इसी कानूनी प्रावधान का पालन सुनिश्चित करने के लिए आवेदक पक्ष ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह पाया कि समझौते की शर्तों के अनुसार मध्यस्थ की नियुक्ति आवश्यक है ताकि मामले का निष्पक्ष निपटारा हो सके।

हाईकोर्ट ने नियुक्त किया एकल आर्बिट्रेटर, ग्रैंड विजन से धोखाधड़ी करने वाले अशोक शर्मा के मामले का होगा निपटारा

न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों और आवेदक पक्ष की दलीलों के अनुसार, समझौते के तहत ग्रैंड विजन के भागीदार द्वारा अशोक शर्मा को नेटवर्क संचालन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से एक करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि प्रदान की गई थी। इसके लिए दोनों पक्षों के बीच विधिवत अनुबंध भी किया गया था। आवेदक का आरोप है कि इस वित्तीय लेनदेन के बाद नेटवर्क संचालन को लेकर प्रतिवादी की ओर से लगातार टालमटोल की नीति अपनाई गई और अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं किया गया। ग्रैंड विजन की ओर से यह भी कहा गया कि उन्होंने बार-बार नेटवर्क सुचारू रूप से चलाने का आग्रह किया, लेकिन प्रतिवादी की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई।

विवाद तब और अधिक गहरा गया जब ग्रैंड विजन की ओर से बार-बार व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए कहने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला। ग्रैंड विजन का आरोप है कि अशोक शर्मा ने न केवल व्यावसायिक शर्तों को पूरा करने में विफलता दिखाई, बल्कि ग्रैंड विजन के भागीदारों, उच्चाधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभिन्न शिकायतें और कानूनी प्रकरण भी दर्ज कराए। इसके जवाब में ग्रैंड विजन ने भी उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर अपनी शिकायत दर्ज कराई और प्रतिवादी को नियमानुसार कानूनी नोटिस जारी किया। इन कानूनी नोटिसों का उद्देश्य विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाना था, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली।

हाईकोर्ट ने नियुक्त किया एकल आर्बिट्रेटर, ग्रैंड विजन से धोखाधड़ी करने वाले अशोक शर्मा के मामले का होगा निपटारा

जब कानूनी नोटिस का कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ, तब ग्रैंड विजन के भागीदार ने हाईकोर्ट में आर्बिट्रेशन के लिए औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब प्रतिवादी पक्ष की ओर से आर्बिट्रेटर की नियुक्ति को लेकर कोई विरोध नहीं जताया गया। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति धीरेन्द्र मिश्रा के नाम पर अपनी सहमति व्यक्त की। न्यायालय ने इस सहमति को रिकॉर्ड पर लेते हुए न्यायमूर्ति धीरेन्द्र मिश्रा को इस मामले का एकल मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश जारी किया। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि व्यावसायिक विवादों में मध्यस्थता एक प्रभावी माध्यम साबित हो सकती है।

हाईकोर्ट ने नियुक्त किया एकल आर्बिट्रेटर, ग्रैंड विजन से धोखाधड़ी करने वाले अशोक शर्मा के मामले का होगा निपटारा

उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में निर्देश दिया है कि मामले से संबंधित समस्त रिकॉर्ड और दस्तावेज न्यायमूर्ति धीरेन्द्र मिश्रा को आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित किए जाएं। आर्बिट्रेटर का पारिश्रमिक और अन्य खर्च दोनों पक्षों की आपसी सहमति से निर्धारित किए जाएंगे। जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा अब दोनों पक्षों के दावों और प्रतिदावों की गहन सुनवाई करेंगे और नियमानुसार अपना निर्णय देंगे। इस आदेश के साथ ही हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेशन रिक्वेस्ट एप्लीकेशन को औपचारिक रूप से निपटा दिया है। अब गेंद आर्बिट्रेटर के पाले में है, जो कानून के दायरे में रहकर इस एक करोड़ रुपये के विवाद पर अंतिम फैसला सुनाएंगे।

यह मामला छत्तीसगढ़ के केबल और नेटवर्क उद्योग में एक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल इस विशिष्ट विवाद के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यावसायिक अनुबंधों में मध्यस्थता की भूमिका और महत्व को भी रेखांकित करता है। आने वाले समय में आर्बिट्रेटर के समक्ष होने वाली सुनवाई इस मामले के कई अन्य तकनीकी और वित्तीय पहलुओं को भी स्पष्ट करेगी। फिलहाल, हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप से दोनों पक्षों को एक निष्पक्ष मंच प्राप्त हुआ है, जहां वे अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत कर सकेंगे और न्याय की उम्मीद कर सकेंगे।

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