घोटाले के लिए मेंटेनेंस का बहाना: सीबीसी मशीनों को कर दिया गया था लॉक, डेढ़ साल बाद भी नहीं खुलीं

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रायपुर में मेंटेनेंस के बहाने सीबीसी मशीनों को लॉक कर घोटाला दबाया गया, डेढ़ साल बाद भी मशीनें बंद, मरीज परेशान और जांच की मांग तेज।

रायपुर। राजधानी रायपुर में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां कथित घोटाले को छिपाने के लिए “मेंटेनेंस” के नाम पर सीबीसी (कम्प्लीट ब्लड काउंट) जांच मशीनों को लॉक कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इन मशीनों को बंद हुए डेढ़ साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक इन्हें दोबारा चालू नहीं किया गया है।

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि मशीनों में गड़बड़ी और फर्जीवाड़े को छिपाने के लिए जानबूझकर उन्हें मेंटेनेंस का बहाना बनाकर सील कर दिया गया, ताकि ऑडिट और जांच से बचा जा सके।


क्या है पूरा मामला?

सूत्रों के अनुसार रायपुर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों और पैथोलॉजी केंद्रों में लगे सीबीसी मशीनों में लंबे समय तक अनियमित जांच और फर्जी बिलिंग की शिकायतें मिल रही थीं। इन मशीनों के माध्यम से खून की जांच होती है और बड़ी संख्या में मरीजों की रिपोर्ट इन्हीं से तैयार की जाती है।

जब विभागीय स्तर पर गड़बड़ियों की आशंका बढ़ी, तब मशीनों को “मेंटेनेंस के लिए बंद” करने का आदेश जारी कर दिया गया। आरोप है कि असल मकसद मशीनों के डेटा और रिकॉर्ड को खंगालने से रोकना था, जिससे घोटाले की परतें न खुल सकें।


डेढ़ साल से बंद, न मेंटेनेंस पूरा न जांच

सबसे गंभीर पहलू यह है कि मशीनों को लॉक किए जाने के बाद न तो उनका मेंटेनेंस पूरा हुआ और न ही कोई तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद मशीनें अब भी बंद पड़ी हैं।

इस दौरान हजारों मरीजों को मजबूरन निजी लैबों में महंगी जांच करानी पड़ी, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा।

स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में मशीनें “मेंटेनेंस मोड” में बताई जा रही हैं, लेकिन न तो कोई एजेंसी काम करती दिखी और न ही मशीनों को दोबारा चालू करने की कोई समय-सीमा तय की गई।


घोटाले की आशंका और बढ़ी

सूत्रों का कहना है कि मशीनों के माध्यम से फर्जी जांच रिपोर्ट, अनावश्यक टेस्ट और गलत बिलिंग कर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया। जब इसकी शिकायतें बढ़ने लगीं, तो मशीनों को लॉक कर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मशीनों का लॉक होना केवल तकनीकी कारण नहीं, बल्कि सबूत मिटाने की रणनीति का हिस्सा था।


मरीजों को हो रही भारी परेशानी

मशीनें बंद होने से अस्पतालों में सीबीसी जांच की सुविधा लगभग ठप हो गई। मरीजों को या तो लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा या फिर निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ा।

गरीब मरीजों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल हो गई, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या कम शुल्क में होने वाली जांच निजी लैबों में कई गुना महंगी पड़ती है।


जिम्मेदार कौन?

इस पूरे मामले में यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि मशीनें लॉक करने का आदेश किस अधिकारी ने दिया और किस एजेंसी को मेंटेनेंस का जिम्मा सौंपा गया। विभागीय फाइलों में कई बार तारीखें बदली गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से जब इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने “तकनीकी कारण” और “बजट की कमी” का हवाला देकर मामला टाल दिया।


जांच की मांग तेज

अब इस मामले को लेकर सामाजिक संगठनों और मरीज अधिकार समूहों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार का मामला है।

मांग की जा रही है कि —

  • मशीनों के लॉक करने के आदेश की जांच हो
  • मेंटेनेंस एजेंसी और संबंधित अधिकारियों की भूमिका तय हो
  • मरीजों से वसूली गई अतिरिक्त राशि की भरपाई की जाए
  • दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए

स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि जांच मशीनों को जानबूझकर बंद रखकर घोटाला दबाया गया, तो यह न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य से सीधा खिलवाड़ भी है।

अब देखना होगा कि शासन इस पूरे मामले में कब और कैसी कार्रवाई करता है, या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।

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