राजस्थान-राज्यपाल ने पीएम श्री विद्यालय में खगोल विज्ञान कक्ष का किया लोकार्पण, भारतीय परम्परा पर की चर्चा
जयपुर। महाराष्ट्र के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने छत्रपति संभाजी नगर में स्थित पीएम श्री विद्यालय में एक अत्याधुनिक खगोल विज्ञान कक्ष का लोकार्पण किया। राज्यपाल ने इस अवसर…

जयपुर। महाराष्ट्र के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने छत्रपति संभाजी नगर में स्थित पीएम श्री विद्यालय में एक अत्याधुनिक खगोल विज्ञान कक्ष का लोकार्पण किया। राज्यपाल ने इस अवसर पर पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की गति से संबंधित आधुनिक खगोल विज्ञान के साथ-साथ भारतीय खगोल परंपरा की समृद्धि पर भी विस्तार से चर्चा की।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि “शिक्षा वही सार्थक है जिसमें हम प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के आलोक में आधुनिक दृष्टि का विकास करें।” उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत खगोल विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का सबसे समृद्ध देश रहा है। राज्यपाल ने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य करें। इस अवसर पर उन्होंने विद्यालय में स्थित औषधि गार्डन का भी फीता काटकर लोकार्पण किया।
पीएम श्री विद्यालय योजना का परिचय
केंद्र सरकार द्वारा सितंबर 2022 में शुरू की गई “पीएम श्री” (Prime Minister Schools for Rising India) योजना देश भर में 14,500 से अधिक विद्यालयों को आदर्श विद्यालयों में बदलने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इन विद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांतों का पूर्ण क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है — जिसमें अनुभवात्मक शिक्षा, बहुभाषी शिक्षण, कौशल विकास और तकनीकी संसाधनों का उपयोग प्रमुख रूप से शामिल हैं।
खगोल विज्ञान कक्ष जैसी विशिष्ट सुविधाएँ इन विद्यालयों की विशेषता हैं। यहाँ टेलीस्कोप, खगोलीय मानचित्र, ग्रहों के मॉडल और कंप्यूटर-आधारित सिमुलेशन के माध्यम से छात्रों को ब्रह्मांड की समझ विकसित करने का अवसर मिलता है।
भारत की प्राचीन खगोल विज्ञान परंपरा
राज्यपाल का यह कथन कि “भारत खगोल विज्ञान में सर्वाधिक समृद्ध देश रहा है”, ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। आर्यभट्ट (5वीं शताब्दी), वराहमिहिर (6वीं शताब्दी), ब्रह्मगुप्त (7वीं शताब्दी) और भास्कराचार्य द्वितीय (12वीं शताब्दी) जैसे महान खगोलशास्त्रियों ने पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन, ग्रहण की गणितीय गणना, और पंचांग निर्माण के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया। आर्यभट्ट ने 6वीं शताब्दी में ही यह बता दिया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है — यह सिद्धांत यूरोप में कोपरनिकस ने लगभग 1000 वर्ष बाद प्रस्तुत किया।
वाराणसी, उज्जैन और जयपुर के जंतर-मंतर तथा केरल के संगमग्राम-केंद्रित गणितीय परंपरा भी इस विरासत के अद्भुत उदाहरण हैं। इसी पृष्ठभूमि में प्राचीन ज्ञान को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है।
औषधि गार्डन का शैक्षणिक महत्व
विद्यालय में औषधि गार्डन का लोकार्पण भारतीय आयुर्वेद परंपरा से छात्रों को जोड़ने का एक उत्कृष्ट प्रयास है। तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा, ब्राह्मी, नीम, अरण्यवाला (आँवला), और सर्पगंधा जैसे पौधे न केवल छात्रों को औषधीय गुणों की जानकारी देते हैं, बल्कि पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता भी बढ़ाते हैं। हाल के वर्षों में आयुर्वेद-आधारित स्वास्थ्य देखभाल की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ी है, ऐसे में इस तरह की पहल छात्रों के भविष्य के करियर अवसरों के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।
विरात महानगर का विश्लेषण: स्कूली शिक्षा में खगोल विज्ञान कक्ष और औषधि गार्डन जैसी विशिष्ट सुविधाओं का जुड़ना भारत की शिक्षा प्रणाली में एक स्वागत योग्य परिवर्तन है। केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित शिक्षा प्रणाली अब अनुभवात्मक और बहु-आयामी सीखने की ओर बढ़ रही है। चुनौती यह है कि पीएम श्री जैसी पहलें केवल कुछ चुनिंदा विद्यालयों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के सरकारी और ग्रामीण विद्यालयों तक भी इनका लाभ पहुँचे। आर्यभट्ट के देश में हर छात्र को आकाश के सितारे पहचानने का अवसर मिलना चाहिए, सिर्फ कुछ चुनिंदा शहरों के स्कूलों में नहीं।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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