रायपुर में फ्री इलाज की आड़ में नशे का खेल उजागर, स्वास्थ्य केंद्र बने नाबालिगों के लिए ड्रग सोर्स, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल।
रायपुर। राजधानी रायपुर में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जहां एक ओर सरकारी और निजी स्वास्थ्य केंद्रों को आमजन के लिए राहत का माध्यम माना जाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ केंद्र फ्री इलाज की आड़ में नाबालिगों को नशे की ओर धकेलने का अड्डा बनते जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ स्वास्थ्य केंद्रों से नशे में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां बिना वैध पर्ची और निगरानी के बच्चों तक पहुंच रही हैं, जिससे पूरा शहर सकते में है।
कैसे बन रहे हैं स्वास्थ्य केंद्र ‘ड्रग सोर्स’?
जानकारी के मुताबिक, राजधानी के कुछ इलाकों में संचालित स्वास्थ्य केंद्रों और मेडिकल स्टोर्स से कोडीन सिरप, ट्रामाडोल, नींद की गोलियां और अन्य नशीली दवाएं आसानी से उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन दवाओं को अक्सर “फ्री इलाज” या “सामान्य दवा” के नाम पर नाबालिगों को दिया जा रहा है।
कई मामलों में बच्चों को पहले मामूली इलाज के बहाने केंद्रों में बुलाया जाता है और बाद में उन्हें इन दवाओं की लत लगा दी जाती है। धीरे-धीरे यही केंद्र ड्रग सप्लाई चेन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
अभिभावक और समाज में बढ़ी चिंता
इस खुलासे के बाद अभिभावकों में गहरा आक्रोश और भय देखा जा रहा है। माता-पिता का कहना है कि वे बच्चों को इलाज के लिए निश्चिंत होकर स्वास्थ्य केंद्र भेजते हैं, लेकिन वहां से वे नशे की गिरफ्त में लौट रहे हैं।
सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अपराध है, जिसमें कुछ स्वास्थ्य कर्मियों और नशा तस्करों की मिलीभगत हो सकती है।
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सवाल
मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
- बिना पर्ची दवाओं की बिक्री कैसे हो रही है?
- नाबालिगों को दवा देने से पहले पहचान और उम्र की जांच क्यों नहीं?
- नियमित निरीक्षण और ऑडिट क्यों नहीं हो पा रहा?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह समस्या पूरी पीढ़ी को नशे की दलदल में धकेल सकती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
मनोचिकित्सकों और नशा मुक्ति विशेषज्ञों के अनुसार, नाबालिगों में नशे की शुरुआत सबसे खतरनाक होती है। कम उम्र में ली गई नशीली दवाएं
- मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं
- पढ़ाई और व्यवहार पर असर डालती हैं
- अपराध की ओर ले जा सकती हैं
उन्होंने स्वास्थ्य केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी, डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन सिस्टम और सख्त लाइसेंस जांच की मांग की है।
अब क्या कार्रवाई संभव?
सूत्रों के अनुसार, जिला प्रशासन इस मामले की प्राथमिक जांच की तैयारी कर रहा है। जल्द ही संदिग्ध स्वास्थ्य केंद्रों और मेडिकल स्टोर्स पर छापेमारी और लाइसेंस जांच की जा सकती है। वहीं, दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मचारियों और संचालकों पर NDPS एक्ट और अन्य सख्त धाराओं में कार्रवाई की संभावना है।
जरूरत है सामूहिक जागरूकता की
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रशासन नहीं, बल्कि
- अभिभावकों
- स्कूलों
- सामाजिक संगठनों
- और स्वयं युवाओं
को मिलकर इस खतरे के खिलाफ आवाज उठानी होगी। तभी राजधानी को नशे के इस बढ़ते जाल से बचाया जा सकता है।

