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बदहाल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम: मेन रोड पर सिटी बस व अंदरूनी इलाकों में ऑटो, राइट्स का ये सुझाव लागू नहीं

📑 इस लेख मेंरायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट बदहाल है। राइट्स की रिपोर्ट में सुझाया गया मेन रोड पर सिटी बस और अंदरूनी इलाकों में ऑटो मॉडल आज तक…

📅 13 February 2026, 11:12 am अपडेट: 16 May 2026
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रायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट बदहाल है। राइट्स की रिपोर्ट में सुझाया गया मेन रोड पर सिटी बस और अंदरूनी इलाकों में ऑटो मॉडल आज तक लागू नहीं हुआ।

रायपुर। राजधानी रायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम लगातार बदहाली की ओर बढ़ता जा रहा है। शहर की सड़कों पर निजी वाहनों की बढ़ती संख्या, घटती सिटी बसें और अव्यवस्थित ऑटो संचालन ने आम यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वर्षों पहले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए तैयार कराई गई रिपोर्ट में यह स्पष्ट सुझाव दिया गया था कि मुख्य सड़कों पर सिटी बसों का संचालन किया जाए और अंदरूनी व रिहायशी इलाकों में ऑटो व फीडर सेवाओं को जोड़ा जाए, लेकिन यह योजना आज तक जमीन पर उतर नहीं सकी है।

शहर के ट्रैफिक और सार्वजनिक परिवहन सुधार के लिए यह अध्ययन देश की प्रतिष्ठित संस्था RITES Ltd द्वारा किया गया था। रिपोर्ट में यह बताया गया था कि यदि सिटी बसें केवल प्रमुख कॉरिडोर और मुख्य मार्गों पर चलें और मोहल्लों, कॉलोनियों व संकरी सड़कों में ऑटो या मिनी फीडर वाहन यात्रियों को बस स्टॉप तक लाएं, तो ट्रैफिक दबाव कम होगा और यात्रियों को बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी।

रिपोर्ट बनी, लेकिन अमल नहीं

राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार रायपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में ‘इंटीग्रेटेड पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम’ की जरूरत है। इसके तहत शहर के बड़े मार्गों – जैसे जीई रोड, एमजी रोड, वीआईपी रोड और अन्य प्रमुख कॉरिडोर पर उच्च क्षमता वाली सिटी बसें चलाने और कॉलोनियों में छोटी दूरी के लिए ऑटो या ई-रिक्शा जैसी सेवाओं को फीडर सिस्टम से जोड़ने का प्रस्ताव था।

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वास्तु शास्त्र के प्रामाणिक उपाय

हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर कई बैठकों और चर्चाओं के बावजूद यह मॉडल लागू नहीं हो सका। नतीजा यह है कि आज भी सिटी बसें सीमित रूटों पर ही सिमटी हुई हैं और अंदरूनी इलाकों के लिए यात्रियों को पूरी तरह ऑटो या निजी साधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

सिटी बसों की संख्या घटती गई

एक समय रायपुर में 100 से अधिक सिटी बसें संचालित होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या घटती चली गई। वर्तमान में बहुत से रूटों पर बसें या तो बंद हो चुकी हैं या फिर बेहद अनियमित चल रही हैं। कई इलाकों में तो सुबह और शाम के पीक ऑवर्स में भी बस नहीं मिलती।

यात्रियों का कहना है कि यदि राइट्स के सुझावों के अनुसार मुख्य सड़कों पर नियमित अंतराल पर बसें उपलब्ध होतीं और कॉलोनियों से बस स्टॉप तक ऑटो या मिनी वाहन की सुविधा रहती, तो निजी दोपहिया और चारपहिया वाहनों की संख्या में निश्चित रूप से कमी आती।

अंदरूनी इलाकों में केवल ऑटो का सहारा

शहर के अधिकांश अंदरूनी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन का एकमात्र साधन ऑटो बन चुका है। कई इलाकों में साझा ऑटो सेवा नहीं होने के कारण यात्रियों को पूरा किराया देना पड़ता है। स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और कामकाजी लोगों के लिए यह व्यवस्था महंगी और असुविधाजनक साबित हो रही है।

राइट्स की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ऑटो और फीडर वाहनों के लिए निर्धारित स्टैंड, तय किराया और समय-सारणी बनाई जानी चाहिए, जिससे यात्रियों को पारदर्शी सेवा मिल सके। लेकिन फिलहाल ऑटो संचालन पूरी तरह अनौपचारिक ढांचे पर आधारित है।

ट्रैफिक दबाव बढ़ने का बड़ा कारण

विशेषज्ञों का मानना है कि रायपुर में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का अभाव है। जब लोगों को समय पर, सस्ती और भरोसेमंद बस सेवा नहीं मिलती, तो वे मजबूरी में निजी वाहन खरीदते हैं।

राइट्स की रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि बस नेटवर्क मजबूत किया जाए और फीडर सिस्टम लागू हो, तो शहर की सड़कों पर 20 से 30 प्रतिशत तक निजी वाहनों का दबाव कम किया जा सकता है।

बस-ऑटो तालमेल की व्यवस्था नहीं

अभी स्थिति यह है कि बस स्टॉप और ऑटो स्टैंड के बीच कोई समन्वय नहीं है। कई जगहों पर बस स्टॉप से ऑटो स्टैंड काफी दूर हैं, जिससे यात्रियों को पैदल चलना पड़ता है या फिर दोबारा ऑटो लेना पड़ता है। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई थी कि हर प्रमुख बस स्टॉप के पास फीडर सेवा के लिए ऑटो और ई-रिक्शा की व्यवस्था की जाए और उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए।

आम लोगों की परेशानी

दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, छात्रों और महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन मौजूदा हालात में उन्हें या तो भीड़भाड़ वाले ऑटो में सफर करना पड़ता है या फिर निजी वाहन का सहारा लेना पड़ता है।

यात्रियों का कहना है कि शहर में लगातार फ्लाईओवर, चौड़ी सड़कें और स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम बनाए जा रहे हैं, लेकिन अगर बसें ही नहीं चलेंगी, तो इन सुधारों का सीधा लाभ आम लोगों को नहीं मिल पाएगा।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

शहर में जाम मुक्त यातायात और प्रदूषण नियंत्रण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब फिर से पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि राइट्स की रिपोर्ट आज भी प्रासंगिक है और यदि उसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो रायपुर में परिवहन व्यवस्था में बड़ा सुधार संभव है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन पुराने सुझावों को अमल में लाकर मेन रोड पर सिटी बस और अंदरूनी इलाकों में ऑटो आधारित फीडर सिस्टम को मजबूत करता है या फिर रायपुर की पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था इसी तरह बदहाल बनी रहेगी।

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