रायपुर सहित छत्तीसगढ़ में चैरिटेबल स्कूलों पर कमर्शियल फीस वसूली का आरोप, अभिभावकों में नाराजगी, पारदर्शी जांच और सख्त नीति की मांग।
रायपुर | प्रदेश में खुद को चैरिटेबल संस्थान बताने वाले कई निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में आ गई है। अभिभावकों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि ये स्कूल कागजों में भले ही सेवा-भाव से संचालित बताए जाते हों, लेकिन हकीकत में इनका पूरा फीस स्ट्रक्चर व्यावसायिक संस्थानों जैसा है।
मामला सिर्फ राजधानी रायपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे
छत्तीसगढ़
में इसी तरह की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
चैरिटेबल टैग, लेकिन फीस पूरी तरह कमर्शियल
अभिभावकों का कहना है कि जिन संस्थानों को आयकर छूट और अन्य सरकारी रियायतें चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत मिल रही हैं, वही स्कूल हर सत्र में फीस बढ़ाकर आम परिवारों पर आर्थिक बोझ डाल रहे हैं।
फीस के नाम पर—
- एडमिशन चार्ज
- डेवलपमेंट फीस
- एक्टिविटी फीस
- स्मार्ट क्लास शुल्क
- ट्रांसपोर्ट और यूनिफॉर्म
जैसे कई मदें जोड़ दी जाती हैं।
अभिभावकों का आरोप है कि कुल मिलाकर सालाना फीस किसी बड़े कॉरपोरेट स्कूल से कम नहीं है।
न समाजसेवा, न जरूरतमंद बच्चों को राहत
चैरिटेबल संस्थानों की मूल अवधारणा जरूरतमंद, गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन रायपुर सहित कई जिलों में संचालित नामी स्कूलों में इसका असर जमीन पर नजर नहीं आता।
अभिभावकों का कहना है कि—
- न तो गरीब बच्चों के लिए निर्धारित कोटा का सही तरीके से पालन हो रहा है,
- न ही किसी तरह की फीस में विशेष छूट दी जा रही है।
कई मामलों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से भी पूरी फीस वसूली जा रही है।
अभिभावकों में बढ़ता असंतोष
रायपुर के अलग-अलग इलाकों से सामने आ रही शिकायतों के अनुसार, कई स्कूलों में फीस बढ़ोतरी को लेकर न तो पारदर्शी जानकारी दी जाती है और न ही किसी प्रकार की सार्वजनिक सूचना जारी की जाती है।
एक अभिभावक ने बताया कि हर साल बिना ठोस कारण के 10 से 15 प्रतिशत तक फीस बढ़ा दी जाती है, लेकिन जब स्कूल प्रबंधन से सवाल किया जाता है, तो जवाब मिलता है कि यह संस्थान की नीति है।
नियमों की आड़ में चल रहा व्यवसाय
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कई चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत चल रहे स्कूल, व्यवहार में पूरी तरह व्यावसायिक मॉडल पर काम कर रहे हैं। उनका ढांचा, मार्केटिंग, प्रचार-प्रसार और सुविधाओं का प्रचार निजी कॉरपोरेट स्कूलों से अलग नहीं है।
कई स्कूलों ने खुद को
Central Board of Secondary Education
से संबद्ध बताकर हाई प्रोफाइल ब्रांडिंग भी शुरू कर रखी है, जिससे आम अभिभावक आकर्षित हो जाते हैं।
सरकारी रियायतों का लाभ, लेकिन सेवा का अभाव
सूत्रों के अनुसार चैरिटेबल ट्रस्ट से संचालित शैक्षणिक संस्थानों को—
- कर संबंधी छूट,
- भूमि आवंटन में सहूलियत,
- प्रशासनिक सुविधाएं
जैसे कई लाभ मिलते हैं।
इसके बावजूद शिक्षा को समाजसेवा के रूप में अपनाने की भावना कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर संस्थान पूरी तरह व्यावसायिक रूप से ही काम करना चाहते हैं, तो उन्हें चैरिटेबल का दर्जा नहीं लेना चाहिए।
फीस नियंत्रण को लेकर निगरानी कमजोर
प्रदेश में निजी स्कूलों की फीस को लेकर नियम तो बने हैं, लेकिन उनका पालन कितना हो रहा है, इस पर प्रभावी निगरानी नहीं दिखती।
अभिभावकों का आरोप है कि—
- शिकायत के बाद भी कार्रवाई बेहद धीमी होती है,
- कई मामलों में स्कूल प्रबंधन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता।
इससे स्कूलों का मनोबल बढ़ता जा रहा है और अभिभावक खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
पारदर्शी ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्ट की मांग
शिक्षा से जुड़े संगठनों की मांग है कि चैरिटेबल ट्रस्ट से संचालित स्कूलों के—
- आय-व्यय का सार्वजनिक ऑडिट
- फीस स्ट्रक्चर की वार्षिक रिपोर्ट
- छात्रवृत्ति व राहत योजना का विवरण
अनिवार्य रूप से सार्वजनिक किया जाए।
उनका मानना है कि जब सरकारी छूट का लाभ लिया जा रहा है, तो समाज के प्रति जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
सरकार से सख्त नीति की अपेक्षा
अभिभावक संघ और सामाजिक संगठन राज्य सरकार से मांग कर रहे हैं कि चैरिटेबल स्कूलों के लिए अलग और सख्त दिशा-निर्देश बनाए जाएं, ताकि—
- वास्तविक जरूरतमंद बच्चों को लाभ मिले,
- मनमानी फीस वसूली पर रोक लगे,
- और शिक्षा को फिर से सेवा का स्वरूप मिल सके।
शिक्षा या व्यवसाय – यही सबसे बड़ा सवाल
रायपुर सहित पूरे प्रदेश में यह बहस अब तेज होती जा रही है कि जब एक संस्थान खुद को समाजसेवी बताता है, तो उसका फीस स्ट्रक्चर भी उसी भावना को दर्शाना चाहिए।
वर्तमान हालात में कई चैरिटेबल स्कूलों की फीस नीति देखकर यही सवाल खड़ा हो रहा है कि
क्या शिक्षा अब सेवा से ज्यादा व्यवसाय बनती जा रही है?

