छत्तीसगढ़ में पीएम आवास: घर कागजों में बने, जमीन पर अधूरी दीवारें; लाभार्थियों की जगह फर्जी लोगों को भुगतान

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छत्तीसगढ़ में पीएम आवास योजना के तहत कई मकान केवल कागजों में बने, अधूरे निर्माण के बावजूद भुगतान और फर्जी लाभार्थियों को राशि दी गई।

रायपुर। प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। राजधानी रायपुर समेत कई जिलों में आवास निर्माण केवल फाइलों और पोर्टल पर पूरा दिखाया गया, जबकि जमीनी हकीकत में कई स्थानों पर सिर्फ अधूरी दीवारें या नींव ही खड़ी है।

मामला सामने आने के बाद छत्तीसगढ़ में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में चल रही आवास योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसे आवास हैं जिनका भुगतान पूरा कर दिया गया, लेकिन मौके पर न तो छत बनी है और न ही रहने योग्य ढांचा तैयार हुआ है। कई गांवों में तो लाभार्थी परिवार आज भी झोपड़ी या कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं, जबकि रिकॉर्ड में उन्हें पक्का मकान मिल चुका है।


कागजों में तैयार, जमीन पर अधूरा निर्माण

जांच के दौरान सामने आया कि कई निर्माण स्थलों पर केवल ईंटों की अधूरी दीवारें खड़ी हैं। कहीं प्लास्टर तक नहीं हुआ, तो कहीं छत डालने का काम भी शुरू नहीं किया गया। इसके बावजूद पोर्टल पर मकान को “पूर्ण” दिखाकर पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई मामलों में निर्माण कार्य शुरू होने के कुछ दिन बाद ही काम बंद हो गया, लेकिन उसके बाद भी किश्तों का भुगतान होता रहा।


असली लाभार्थियों की जगह फर्जी नामों से भुगतान

सबसे गंभीर आरोप यह है कि वास्तविक जरूरतमंद परिवारों की जगह कुछ फर्जी या अपात्र लोगों के नाम पर भुगतान कर दिया गया। कई स्थानों पर ऐसे लोगों के खाते में राशि भेजी गई, जिनके नाम पर जमीन ही नहीं थी या जो उस क्षेत्र में रहते भी नहीं थे।

कुछ मामलों में एक ही परिवार से जुड़े लोगों के नाम पर अलग-अलग आवास स्वीकृत दिखाए गए हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि आवंटन और सत्यापन प्रक्रिया में भारी लापरवाही या मिलीभगत हुई है।


ग्राम स्तर पर सत्यापन प्रणाली पर सवाल

ग्रामीण क्षेत्रों में आवास स्वीकृति और निर्माण की प्रगति की जिम्मेदारी स्थानीय अमले पर होती है। लेकिन जांच में यह स्पष्ट हो रहा है कि मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किए बिना ही रिपोर्ट अपलोड कर दी गई।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, कई फाइलों में निर्माण की तस्वीरें भी संदिग्ध पाई गई हैं। कुछ मामलों में एक ही मकान की तस्वीर अलग-अलग लाभार्थियों के नाम से अपलोड की गई है।


शिकायतों के बाद शुरू हुई जांच

लगातार मिल रही शिकायतों के बाद जिला स्तर पर टीमों का गठन कर स्थलीय निरीक्षण शुरू किया गया। शुरुआती जांच में ही कई अनियमितताओं की पुष्टि हुई है।

सूत्र बताते हैं कि कुछ ब्लॉकों में 30 से 40 प्रतिशत तक ऐसे आवास पाए गए हैं, जिनका निर्माण अधूरा है, लेकिन उन्हें पूर्ण दिखाकर राशि का आहरण कर लिया गया।


तकनीकी निगरानी भी नहीं रोक पाई गड़बड़ी

हालांकि योजना में जियो टैगिंग, फोटो अपलोड और ऑनलाइन प्रगति रिपोर्ट जैसी तकनीकी व्यवस्थाएं लागू हैं, लेकिन इसके बावजूद गड़बड़ी सामने आना सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फील्ड स्तर पर निरीक्षण और तीसरे पक्ष से सत्यापन की व्यवस्था मजबूत होती, तो इस तरह की धांधली रोकी जा सकती थी।


जरूरतमंद परिवारों में आक्रोश

जिन परिवारों को वास्तव में आवास की जरूरत थी, उनमें इस खुलासे के बाद भारी नाराजगी देखी जा रही है। कई लाभार्थियों का कहना है कि उन्होंने बार-बार अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उनकी फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।

कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे अप्रत्यक्ष रूप से पैसे या “सेवा शुल्क” की मांग की गई थी।


जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर जांच

प्रशासनिक स्तर पर अब इस पूरे मामले में संबंधित पंचायत सचिवों, तकनीकी सहायकों और आवास योजना से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। जिन परियोजनाओं में बिना निर्माण के भुगतान हुआ है, वहां जवाबदेही तय करने की तैयारी की जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों पर निलंबन की कार्रवाई भी संभव है।


रिकवरी और एफआईआर की तैयारी

जहां-जहां फर्जी या गलत भुगतान की पुष्टि होगी, वहां संबंधित व्यक्तियों से राशि की रिकवरी की जाएगी। इसके साथ ही गंभीर मामलों में आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की भी तैयारी चल रही है।

प्रशासन का दावा है कि अब सभी संदिग्ध आवासों का दोबारा भौतिक सत्यापन कराया जाएगा और पूरी रिपोर्ट शासन को सौंपी जाएगी।


योजना की विश्वसनीयता पर असर

प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य गरीब और बेघर परिवारों को सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना है, लेकिन प्रदेश में सामने आई यह अनियमितताएं योजना की विश्वसनीयता को गहरा झटका दे रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी लागू नहीं होगी, तब तक इस तरह की गड़बड़ियों पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल है।

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