मैं टोनही नहीं हूं… : दाग से मुक्ति के लिए 20–21 सालों का संघर्ष, कोई कोर्ट में लड़ी तो कोई समाज से
📑 इस लेख मेंछत्तीसगढ़ में टोनही के दाग से जूझती महिलाओं की 20 साल लंबी लड़ाई, अदालत, समाज और अंधविश्वास के खिलाफ़ संघर्ष की सच्ची कहानी।20–21 सालों की…
छत्तीसगढ़ में टोनही के दाग से जूझती महिलाओं की 20 साल लंबी लड़ाई, अदालत, समाज और अंधविश्वास के खिलाफ़ संघर्ष की सच्ची कहानी।
रायपुर। ये सिर्फ़ एक वाक्य नहीं, बल्कि उन हज़ारों महिलाओं की चीख़ है, जिन्हें बीते दो दशकों से समाज ने अंधविश्वास की आग में झोंक दिया। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में आज भी ‘टोनही’ (डायन) का दाग महिलाओं की ज़िंदगी तबाह कर रहा है। कोई 20 साल से अदालतों के चक्कर काट रही है, तो कोई रोज़ समाज की नफ़रत से लड़ रही है।
रायपुर, महासमुंद, जशपुर, बलरामपुर और सरगुजा जैसे जिलों में टोनही प्रताड़ना के मामले सिर्फ़ आंकड़े नहीं, बल्कि टूटती ज़िंदगियों की कहानियां हैं।
20–21 सालों की लड़ाई: इंसाफ़ अब भी अधूरा
रायपुर की रहने वाली 48 वर्षीय महिला (नाम परिवर्तित) बताती हैं कि साल 2003 में गांव के एक बच्चे की बीमारी के बाद उन्हें टोनही घोषित कर दिया गया। इसके बाद मारपीट, सामाजिक बहिष्कार और जमीन छीन लेने तक की घटनाएं हुईं। उन्होंने केस दर्ज कराया, लेकिन फैसला आने में 20 साल से ज़्यादा लग गए।
वहीं महासमुंद की एक महिला आज भी अदालतों में इंसाफ़ की उम्मीद लिए खड़ी है। उनका कहना है,
“कानून बना, केस चला, लेकिन समाज की सोच नहीं बदली।”
कानून है, लेकिन डर अब भी ज़िंदा
छत्तीसगढ़ सरकार ने टोनही प्रताड़ना रोकने के लिए छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम बनाया, जिसके तहत दोषियों को सज़ा का प्रावधान है। बावजूद इसके, ज़मीनी हकीकत अलग है।
कई मामलों में:
- पुलिस तक शिकायत नहीं पहुंच पाती
- सामाजिक दबाव में केस वापस ले लिए जाते हैं
- पीड़ित महिलाओं को गांव छोड़ने पर मजबूर किया जाता है
विशेषज्ञ मानते हैं कि कानून तभी असरदार होगा, जब समाजिक सोच बदलेगी।
समाज से लड़ाई, अकेलेपन की सज़ा
टोनही का आरोप लगते ही महिलाओं को:
- गांव से बाहर कर दिया जाता है
- पानी, राशन और इलाज से वंचित किया जाता है
- बच्चों को स्कूल में अपमान सहना पड़ता है
कुछ महिलाओं ने रायपुर जैसे शहरों में आकर नई ज़िंदगी शुरू करने की कोशिश की, लेकिन मानसिक घाव अब भी ताज़ा हैं।
अंधविश्वास की जड़ें और अशिक्षा
समाजशास्त्रियों के अनुसार, टोनही प्रथा की जड़ें:
- अशिक्षा
- झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं का प्रभाव
- संपत्ति विवाद
- महिला विरोधी मानसिकता
इन कारणों से आज भी महिलाओं को आसानी से निशाना बना लिया जाता है।
उम्मीद की किरण: जागरूकता और साहस
बीते कुछ वर्षों में स्वयंसेवी संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता पीड़ित महिलाओं की आवाज़ बनकर सामने आए हैं। रायपुर में कई मंचों पर अब महिलाएं खुलकर कह रही हैं—
“मैं टोनही नहीं हूं, मैं इंसान हूं।”
सरकारी योजनाएं, स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम और कानूनी सहायता धीरे-धीरे असर दिखा रहे हैं, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।
ज़रूरत बदलाव की
20–21 सालों का संघर्ष बताता है कि लड़ाई सिर्फ़ कोर्ट में नहीं, सोच के खिलाफ़ है। जब तक समाज सवाल करना नहीं सीखेगा, तब तक कोई न कोई महिला टोनही कहलाकर चुप करा दी जाएगी।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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