पहली बार दंतेवाड़ा में दलहन–सब्जी की एकसाथ खेती, किसानों की आमदनी डेढ़ गुना तक बढ़ी
📑 इस लेख मेंदंतेवाड़ा में पहली बार दलहन और सब्जी की संयुक्त खेती सफल, किसानों की आमदनी डेढ़ गुना बढ़ी, लागत कम रही और आदिवासी किसानों को सीधा…
दंतेवाड़ा में पहली बार दलहन और सब्जी की संयुक्त खेती सफल, किसानों की आमदनी डेढ़ गुना बढ़ी, लागत कम रही और आदिवासी किसानों को सीधा लाभ मिला।
दंतेवाड़ा/रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक बड़ी और सकारात्मक पहल सामने आई है। जिले में पहली बार दलहन और सब्जी की एकसाथ खेती (इंटरक्रॉपिंग मॉडल) को सफलतापूर्वक अपनाया गया है, जिससे किसानों की आमदनी पहले की तुलना में करीब डेढ़ गुना तक बढ़ी है।
कृषि विभाग के मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग से जिले के चयनित गांवों में इस नवाचार की शुरुआत की गई थी। परंपरागत खेती में जहां किसान केवल एक ही फसल पर निर्भर रहते थे, वहीं अब एक ही खेत में दलहन फसल के साथ सब्जियों की खेती कर दोहरी आमदनी का रास्ता खुल गया है।
पहली बार लागू हुआ संयुक्त खेती मॉडल
दंतेवाड़ा जिले में इस वर्ष खरीफ और रबी सीजन के दौरान पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर दलहन के साथ टमाटर, भिंडी, बैंगन, मिर्च और लौकी जैसी सब्जियों की खेती कराई गई। इस मॉडल में मुख्य फसल के रूप में उड़द, मूंग और अरहर जैसी दलहनी फसलें बोई गईं और उनके बीच कतारों में सब्जी फसल लगाई गई।
इससे खेत की उत्पादकता बढ़ी और खाली जगह का बेहतर उपयोग संभव हुआ।
लागत कम, मुनाफा ज्यादा
कृषि अधिकारियों के अनुसार दलहन-सब्जी एकीकृत खेती से किसानों की लागत में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ। दलहन से जहां निश्चित और स्थिर उत्पादन मिला, वहीं सब्जियों की बिक्री से किसानों को त्वरित नकद आय प्राप्त हुई।
कई किसानों ने बताया कि पहले एक सीजन में जितनी आय होती थी, अब उसी खेत से डेढ़ गुना तक आमदनी मिल रही है।
आदिवासी किसानों को मिला सीधा लाभ
दंतेवाड़ा जिले के अधिकांश किसान आदिवासी समुदाय से जुड़े हैं, जो सीमित संसाधनों के साथ खेती करते हैं। इस नई तकनीक से उन्हें खेती में जोखिम कम करने और नियमित आय सुनिश्चित करने में मदद मिली है।
सब्जियों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में भी आसानी हुई।
कृषि विभाग ने दी तकनीकी सहायता
जिला कृषि विभाग द्वारा किसानों को बीज, पौध रोपण सामग्री, जैविक खाद, कीट नियंत्रण और सिंचाई प्रबंधन की तकनीकी जानकारी दी गई। इसके साथ ही खेतों में नियमित भ्रमण कर कृषि वैज्ञानिकों और विस्तार अधिकारियों ने किसानों को प्रशिक्षण भी दिया।
अधिकारियों के अनुसार इंटरक्रॉपिंग मॉडल से मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार हुआ है, क्योंकि दलहनी फसलें प्राकृतिक रूप से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं।
जल और भूमि का बेहतर उपयोग
संयुक्त खेती मॉडल से सिंचाई जल का संतुलित उपयोग संभव हो सका। पहले जहां केवल एक फसल के लिए पानी दिया जाता था, अब उसी सिंचाई से दो फसलें लाभ उठा रही हैं। इससे जल संरक्षण के साथ-साथ भूमि की उत्पादक क्षमता भी बढ़ी है।
आने वाले सीजन में और गांवों में होगा विस्तार
कृषि विभाग ने इस सफल प्रयोग के बाद अगले सीजन से दंतेवाड़ा जिले के और अधिक गांवों में दलहन-सब्जी संयुक्त खेती मॉडल लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए किसानों की सूची तैयार की जा रही है और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी प्रस्तावित किए गए हैं।
अधिकारियों का कहना है कि इस मॉडल को जिले में स्थायी आजीविका का मजबूत आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।
किसानों में बढ़ा आत्मविश्वास
नई तकनीक से बेहतर परिणाम मिलने के बाद किसानों में खेती को लेकर आत्मविश्वास भी बढ़ा है। कई किसानों ने आगामी सीजन में रकबा बढ़ाने की इच्छा जताई है।
स्थानीय किसान बताते हैं कि सब्जी की नियमित बिक्री से घर की जरूरतों के साथ बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य खर्चों में भी मदद मिल रही है।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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