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गांव लौटने पर मारे जाने का डर: बीजापुर में नक्सल पीड़ित परिवारों के मकानों पर चला बुलडोजर

📑 इस लेख मेंबीजापुर में नक्सल पीड़ित परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चला। गांव लौटने पर नक्सली हिंसा का डर, बिना पुनर्वास उजाड़े जाने पर सवाल खड़े हुए।नक्सल…

📅 17 January 2026, 11:04 am अपडेट: 16 May 2026
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बीजापुर में नक्सल पीड़ित परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चला। गांव लौटने पर नक्सली हिंसा का डर, बिना पुनर्वास उजाड़े जाने पर सवाल खड़े हुए।

बीजापुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में एक बार फिर मानवता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नक्सल हिंसा से जान बचाकर गांव छोड़ चुके पीड़ित परिवारों के अस्थायी और स्थायी मकानों पर प्रशासन द्वारा बुलडोजर चलाए जाने से विवाद गहराता जा रहा है। इन परिवारों का कहना है कि वे पहले ही नक्सलियों के डर से अपने गांवों में लौटने में असमर्थ हैं और अब उनके सिर से छत भी छीन ली गई है।

पीड़ित परिवारों का आरोप है कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त पुनर्वास व्यवस्था के उनके मकानों को अवैध बताते हुए ध्वस्त कर दिया, जिससे वे खुले आसमान के नीचे आने को मजबूर हो गए हैं।


नक्सल हिंसा के कारण छोड़ा था गांव

बीजापुर जिले के कई गांवों से वर्षों पहले सैकड़ों परिवार नक्सली धमकियों, हिंसा और हत्या के डर से पलायन कर चुके हैं। ये परिवार जिला मुख्यालय या सुरक्षित इलाकों में झोपड़ी और छोटे मकान बनाकर रह रहे थे। उनका कहना है कि गांव लौटने पर नक्सलियों द्वारा जान से मारने की धमकी अब भी बनी हुई है।


मकानों पर बुलडोजर से बढ़ी पीड़ा

हाल ही में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान इन विस्थापित परिवारों के मकानों को अतिक्रमण बताते हुए तोड़ दिया गया। इस कार्रवाई से—

  • महिलाओं और बच्चों की स्थिति और खराब हो गई
  • बुजुर्ग खुले में रहने को मजबूर हुए
  • रोजी-रोटी और सुरक्षा दोनों संकट में पड़ गई

पीड़ितों का कहना है कि उन्हें न तो पहले कोई वैकल्पिक व्यवस्था दी गई और न ही पुनर्वास की ठोस योजना बताई गई।


“गांव गए तो नक्सली मार देंगे”

एक पीड़ित महिला ने बताया,
“हम अपने गांव वापस जाना चाहते हैं, लेकिन नक्सली आज भी हमें दुश्मन मानते हैं। वहां गए तो जान से मार देंगे। अब यहां से भी हटा दिया गया, तो हम जाएं कहां?”

कई परिवारों ने प्रशासन से सुरक्षित पुनर्वास और स्थायी आवास की मांग की है।


मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल

इस कार्रवाई के बाद मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं कि—

  • क्या नक्सल पीड़ितों को बिना पुनर्वास उजाड़ना सही है?
  • क्या सुरक्षा कारणों से विस्थापित लोगों के लिए विशेष नीति नहीं होनी चाहिए?

उन्होंने प्रशासन से तत्काल राहत और पुनर्वास पैकेज लागू करने की मांग की है।


प्रशासन का पक्ष

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि कार्रवाई सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे को हटाने के तहत की गई है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि—

  • विस्थापित परिवारों के पुनर्वास पर विचार किया जा रहा है
  • शासन की योजनाओं के तहत सहायता दी जाएगी

हालांकि, जमीनी स्तर पर पीड़ित परिवारों को अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली है।


पुनर्वास नीति पर उठे सवाल

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि नक्सल प्रभावित इलाकों से विस्थापित लोगों के लिए—

  • स्थायी पुनर्वास नीति
  • सुरक्षित आवास
  • आजीविका और सुरक्षा

जैसी मूलभूत जरूरतों पर पर्याप्त काम क्यों नहीं हो पा रहा है।


निष्कर्ष

बीजापुर में नक्सल पीड़ित परिवार पहले जान बचाने के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हुए और अब उनके अस्थायी ठिकानों पर बुलडोजर चलने से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। सुरक्षा और मानवता के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए अब बड़ी चुनौती बन गया है।

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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल

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