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महासमुंद के किसान 65 एकड़ में कर रहे ऑर्गेनिक खेती : पुरखों से मिली परंपरा, 21 एकड़ जमीन पर कभी यूरिया-डीएपी ही नहीं डाला

महासमुंद के किसान 65 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं, 21 एकड़ जमीन पर कभी रासायनिक खाद नहीं डाली, पारंपरिक खेती बन रही प्रेरणा। महासमुंद। छत्तीसगढ़ के…

📅 23 February 2026, 4:14 pm अपडेट: 16 May 2026
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महासमुंद के किसान 65 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं, 21 एकड़ जमीन पर कभी रासायनिक खाद नहीं डाली, पारंपरिक खेती बन रही प्रेरणा।

महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कुछ किसानों ने पारंपरिक खेती की विरासत को संभालते हुए ऑर्गेनिक खेती का सफल मॉडल तैयार किया है। जिले के इन किसानों द्वारा करीब 65 एकड़ जमीन पर पूरी तरह जैविक तरीके से खेती की जा रही है। खास बात यह है कि इनमें से 21 एकड़ भूमि ऐसी है, जहां वर्षों से रासायनिक खाद जैसे यूरिया और डीएपी का उपयोग नहीं किया गया। प्राकृतिक तरीकों से खेती करने का यह प्रयास अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है।

स्थानीय किसानों का कहना है कि यह परंपरा उन्हें अपने पुरखों से मिली है। पहले के समय में लोग गोबर खाद, जीवामृत और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करते थे, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी। आधुनिक खेती के दौर में कई किसानों ने रासायनिक खादों का सहारा लिया, लेकिन इन किसानों ने पारंपरिक तरीके को बनाए रखा और धीरे-धीरे इसे आधुनिक ऑर्गेनिक खेती के रूप में विकसित किया।

किसानों के अनुसार, शुरुआत में जैविक खेती को अपनाना चुनौतीपूर्ण था क्योंकि उत्पादन और बाजार को लेकर कई सवाल थे। लेकिन समय के साथ मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ और फसलों की लागत भी कम होने लगी। उन्होंने बताया कि रासायनिक खादों पर खर्च न होने से खेती अधिक लाभकारी बन रही है। साथ ही, ऑर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती मांग से उन्हें बेहतर बाजार मूल्य भी मिल रहा है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता पर असर पड़ता है, जबकि जैविक खेती से भूमि की संरचना और पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। महासमुंद के किसानों द्वारा अपनाया गया यह मॉडल टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऐसे प्रयासों को बढ़ावा मिले तो पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की आय में भी वृद्धि हो सकती है।

ऑर्गेनिक खेती करने वाले किसानों ने बताया कि वे फसल उत्पादन के लिए गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। इससे न केवल फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि मिट्टी और जल स्रोत भी सुरक्षित रहते हैं। उन्होंने कहा कि जैविक खेती से स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इसमें रासायनिक अवशेषों का खतरा कम होता है।

स्थानीय कृषि विभाग के अधिकारियों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है। किसानों को प्रशिक्षण, प्रमाणन और बाजार से जोड़ने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि वे अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें। अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि महासमुंद का यह मॉडल अन्य जिलों के किसानों को भी प्रेरित करेगा।

ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां लोग जैविक खेती को जोखिम भरा मानते थे, वहीं अब धीरे-धीरे कई किसान इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। क्षेत्र में आयोजित कृषि कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी इन किसानों को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

महासमुंद के किसानों की यह पहल इस बात का संकेत है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। 65 एकड़ में की जा रही ऑर्गेनिक खेती न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ कृषि मॉडल भी प्रस्तुत करती है।



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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल

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