भारतमाला प्रोजेक्ट की कीमत पर्यावरण ने चुकाई: सड़क निर्माण में कटे 86 हजार पेड़, 4.5 लाख पौधे रोपण की चुनौती, जमीन ही नहीं
📑 इस लेख मेंभारतमाला परियोजना में 86 हजार पेड़ कटे, बदले में 4.5 लाख पौधे लगाने का नियम, लेकिन छत्तीसगढ़ में पौधरोपण के लिए जमीन की कमी बड़ी…
भारतमाला परियोजना में 86 हजार पेड़ कटे, बदले में 4.5 लाख पौधे लगाने का नियम, लेकिन छत्तीसगढ़ में पौधरोपण के लिए जमीन की कमी बड़ी चुनौती।
रायपुर। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना के तहत छत्तीसगढ़ में तेज़ी से सड़क निर्माण कार्य तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसकी भारी पर्यावरणीय कीमत भी सामने आ रही है। परियोजना के अंतर्गत सड़कों के निर्माण के लिए करीब 86 हजार पेड़ों की कटाई की गई है। नियमों के अनुसार इसके बदले 4.5 लाख पौधे रोपे जाने हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में पौधरोपण के लिए जमीन आखिर मिलेगी कहां?
सड़क विकास बनाम पर्यावरण संतुलन
भारतमाला परियोजना का उद्देश्य राज्यों को तेज़ और सुरक्षित सड़क नेटवर्क से जोड़ना है, जिससे व्यापार, आवागमन और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले। छत्तीसगढ़ में भी कई राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे इसी योजना के तहत बनाए जा रहे हैं। मगर इन सड़कों के लिए बड़े पैमाने पर वनभूमि और ग्रामीण इलाकों में पेड़ों की बलि चढ़ी है।
नियमों में क्या है प्रावधान
वन विभाग के नियमों के अनुसार जितने पेड़ काटे जाते हैं, उसके कम से कम पांच गुना पौधे रोपना अनिवार्य है। इसी के तहत 86 हजार पेड़ों की कटाई के बदले लगभग 4.5 लाख पौधों का रोपण किया जाना तय है। इसके लिए संबंधित एजेंसी को क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation) करना होता है।
जमीन बनी सबसे बड़ी बाधा
वन विभाग और निर्माण एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी समस्या उपयुक्त भूमि की कमी है। शहरी क्षेत्रों में खाली जमीन नहीं है, वहीं ग्रामीण इलाकों में जमीन निजी स्वामित्व में है या फिर कृषि उपयोग में है। कई जिलों में वन विभाग के पास इतनी खाली वन भूमि ही उपलब्ध नहीं है, जहां लाखों पौधे लगाए जा सकें।
कागजों में पौधरोपण, ज़मीन पर सवाल
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार पौधरोपण की संख्या कागजों में पूरी दिखा दी जाती है, लेकिन जमीन पर उसका प्रभाव नजर नहीं आता। यदि समय रहते पौधरोपण के लिए जमीन चिन्हित नहीं की गई, तो यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
पर्यावरणविदों की चिंता
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पेड़ केवल संख्या नहीं होते, बल्कि जैव विविधता, भूजल, तापमान नियंत्रण और वन्यजीवों के आवास से जुड़े होते हैं। सड़क बन जाने के बाद यदि हरियाली वापस नहीं आई, तो इसका असर आने वाले वर्षों में जल संकट और तापमान वृद्धि के रूप में सामने आएगा।
प्रशासन की सफाई
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि पौधरोपण के लिए वैकल्पिक भूमि चिन्हित करने की प्रक्रिया जारी है। कुछ क्षेत्रों में सड़क किनारे, नहरों के किनारे और शासकीय भूमि पर पौधे लगाए जाने की योजना बनाई जा रही है। साथ ही पंचायतों और स्थानीय निकायों की मदद से सामुदायिक भूमि का भी उपयोग किया जा सकता है।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
जिन इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए हैं, वहां के ग्रामीणों का कहना है कि गर्मी बढ़ गई है और छाया समाप्त हो गई है। लोगों को डर है कि यदि समय पर पौधरोपण नहीं हुआ, तो भविष्य में हालात और खराब होंगे।
आगे की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतमाला जैसी परियोजनाओं में सड़क निर्माण के साथ-साथ पूर्व नियोजित वृक्षारोपण योजना अनिवार्य होनी चाहिए। केवल लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं, बल्कि जमीन, निगरानी और पौधों की देखरेख की भी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए।
भारत के विकास की रफ्तार जरूरी है, लेकिन यह तभी टिकाऊ होगी जब पर्यावरण संरक्षण को समान प्राथमिकता दी जाए। भारतमाला परियोजना के तहत पेड़ों की कटाई और पौधरोपण की यह चुनौती आने वाले समय में सरकार और समाज दोनों के लिए बड़ी परीक्षा साबित होगी।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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