डाइट पेंड्रा में प्राचार्य अपने पैसों से गरीब छात्रों को मुफ्त कोचिंग दे रहे हैं, अब तक 300 से ज्यादा युवा शिक्षक बनकर गरीबी से बाहर निकले।
रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में जहां गरीबी और बेरोजगारी युवाओं के सपनों पर भारी पड़ती नजर आती है, वहीं डाइट पेंड्रा (जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान) एक ऐसी उम्मीद की पाठशाला बनकर उभरा है, जिसने सैकड़ों गरीब और जरूरतमंद छात्रों की जिंदगी बदल दी है। यहां के प्राचार्य ने अपनी निजी कमाई से कोचिंग शुरू कर न केवल शिक्षा को सुलभ बनाया, बल्कि अब तक करीब 300 युवाओं को शिक्षक बनने का रास्ता भी दिखाया है।
यह पहल न सिर्फ शैक्षणिक दुनिया में मिसाल बन गई है, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा भी बन रही है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़ा बदलाव संभव है।
अपने पैसों से शुरू की कोचिंग, मुफ्त में पढ़ते हैं गरीब छात्र
डाइट पेंड्रा के प्राचार्य ने कुछ वर्ष पहले देखा कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्र शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की महंगी कोचिंग फीस के कारण पीछे रह जाते हैं। कई होनहार युवा सिर्फ पैसों की कमी के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा तक नहीं ले पाते थे।
इसी पीड़ा को समझते हुए उन्होंने—
- अपनी निजी तनख्वाह से कोचिंग की शुरुआत की
- गरीब, बेरोजगार और ग्रामीण छात्रों को पूरी तरह मुफ्त प्रशिक्षण देना शुरू किया
- किताबें, नोट्स और मार्गदर्शन भी बिना शुल्क उपलब्ध कराया
धीरे-धीरे यह कोचिंग सेंटर उम्मीद की पाठशाला बन गया।
300 से ज्यादा छात्र बन चुके शिक्षक
इस अनूठी पहल का परिणाम भी बेहद सकारात्मक रहा। अब तक—
- लगभग 300 से अधिक छात्र शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में सफल हो चुके हैं
- कई छात्र सरकारी स्कूलों में अध्यापक बनकर सेवाएं दे रहे हैं
- कुछ ने निजी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में भी नौकरी पाई है
इनमें से ज्यादातर छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां—
- माता-पिता मजदूरी करते हैं
- खेती ही आजीविका का साधन है
- पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल था
आज वही छात्र अपने परिवार का सहारा बन चुके हैं।
डाइट पेंड्रा बना शिक्षा का मॉडल केंद्र
डाइट पेंड्रा अब केवल प्रशिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन का केंद्र बन गया है। यहां—
- शिक्षक भर्ती परीक्षा की विशेष कक्षाएं
- विषयवार प्रशिक्षण
- मॉक टेस्ट और इंटरव्यू की तैयारी
- मानसिक संबल और करियर काउंसलिंग
भी दी जाती है।
प्राचार्य खुद नियमित रूप से कक्षाएं लेते हैं और अनुभवी शिक्षकों को भी नि:शुल्क पढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं।
“शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है” – प्राचार्य
इस पहल पर प्राचार्य ने कहा,
“मैं खुद एक साधारण परिवार से आया हूं। जानता हूं कि गरीबी कैसे सपनों को तोड़ देती है। अगर मेरी थोड़ी-सी मदद से कोई बच्चा शिक्षक बन सकता है, तो इससे बड़ी खुशी कोई नहीं।”
उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य—
- बेरोजगारी कम करना
- ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे लाना
- शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना
है।
छात्रों की जुबानी सफलता की कहानी
कोचिंग से चयनित कई छात्रों ने भावुक होकर बताया कि—
“अगर यह कोचिंग नहीं होती, तो हम आज भी खेतों या मजदूरी में लगे होते। सर ने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं, बल्कि भरोसा भी दिया कि हम कुछ कर सकते हैं।”
एक छात्रा ने कहा कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, लेकिन आज शिक्षक बनकर वह पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही है।
प्रशासन और शिक्षा विभाग में भी सराहना
इस पहल की जानकारी मिलने के बाद—
- शिक्षा विभाग
- जिला प्रशासन
- कई सामाजिक संगठनों
ने प्राचार्य की खुले दिल से सराहना की है। कई अधिकारियों ने इसे छत्तीसगढ़ मॉडल के रूप में अपनाने की बात कही है, ताकि अन्य जिलों में भी ऐसी पहल शुरू की जा सके।
भविष्य की योजना: और ज्यादा छात्रों तक पहुंचे मदद
डाइट पेंड्रा प्रबंधन अब योजना बना रहा है कि—
- कोचिंग का दायरा बढ़ाया जाए
- ऑनलाइन क्लास की सुविधा शुरू की जाए
- अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी कराई जाए
ताकि और ज्यादा गरीब युवाओं को रोजगार मिल सके।
निष्कर्ष
डाइट पेंड्रा की यह कहानी साबित करती है कि शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज बदलने का सबसे मजबूत माध्यम है। एक प्राचार्य की पहल ने 300 से ज्यादा परिवारों की किस्मत बदल दी और हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की नई राह खोल दी।

