PHQ और गृह विभाग की लेटलतीफी से छत्तीसगढ़ को पहली बार पुलिस पदक नहीं मिला, जबकि जवानों ने बसवा समेत 286 नक्सलियों को ढेर किया।
रायपुर। छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय (PHQ) और गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि छत्तीसगढ़ को पुलिस पदकों की सूची में कोई भी सम्मान नहीं मिला, जबकि बीते वर्ष सुरक्षा बलों ने नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की थीं। जवानों ने मुठभेड़ों में कुख्यात नक्सली बसवा समेत कुल 286 नक्सलियों को मार गिराया, इसके बावजूद किसी भी अधिकारी या जवान का नाम पदक के लिए अनुशंसित नहीं हो सका।
लेटलतीफी बनी बड़ी वजह
सूत्रों के अनुसार, पुलिस पदकों के लिए नाम भेजने की प्रक्रिया समय-सीमा के भीतर पूरी नहीं की गई।
- PHQ स्तर पर फाइलें समय पर तैयार नहीं हुईं
- गृह विभाग तक प्रस्ताव देर से पहुंचा
- केंद्र सरकार को निर्धारित तिथि तक अनुशंसा नहीं भेजी जा सकी
इस प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा उन जवानों को भुगतना पड़ा, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर नक्सलवाद के खिलाफ मोर्चा संभाला।
नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक सफलता
पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने—
- बस्तर संभाग में बड़े नक्सल ऑपरेशन
- शीर्ष नक्सली बसवा का एनकाउंटर
- 286 नक्सलियों को ढेर
- कई हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार
- बड़े हथियार भंडार बरामद
जैसी बड़ी सफलताएं हासिल की थीं। इसके बावजूद पदक सूची से राज्य का नाम गायब रहना जवानों के मनोबल पर सवाल खड़े करता है।
जवानों का मनोबल आहत
पुलिस महकमे से जुड़े सूत्रों का कहना है कि—
- जवानों में निराशा का माहौल
- जोखिम भरे ऑपरेशन के बाद भी सम्मान न मिलना
- फील्ड में कार्यरत बलों का मनोबल प्रभावित
कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे “प्रशासनिक असंवेदनशीलता” बताया है।
पहले मिलते रहे हैं दर्जनों पदक
अब तक हर वर्ष—
- राष्ट्रपति पुलिस पदक
- वीरता पदक
- विशिष्ट सेवा पदक
छत्तीसगढ़ को मिलते रहे हैं। नक्सल प्रभावित राज्य होने के कारण यहां के जवानों को अक्सर केंद्र से विशेष सम्मान मिलता था। लेकिन इस बार शून्य उपलब्धि ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी।
जिम्मेदार कौन?
इस पूरे मामले में सवाल उठ रहे हैं कि—
- क्या PHQ की लापरवाही जिम्मेदार है?
- या गृह विभाग ने समय पर फाइल आगे नहीं बढ़ाई?
- क्या अधिकारियों की आपसी तालमेल की कमी जवानों पर भारी पड़ी?
हालांकि अभी तक किसी भी स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।
सरकार से जवाब की मांग
इस मुद्दे को लेकर—
- पुलिस संगठनों में नाराजगी
- पूर्व अधिकारियों ने जांच की मांग
- सरकार से स्पष्टीकरण की अपेक्षा
की जा रही है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो इसका असर भविष्य के ऑपरेशनों पर भी पड़ सकता है।
सम्मान सिर्फ पदक नहीं, मनोबल का सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि—
- पदक केवल सम्मान नहीं, बल्कि जवानों के त्याग की पहचान होते हैं
- यह लापरवाही शहीदों और ऑपरेशन में शामिल बलों के साथ अन्याय है
- ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना जरूरी है

