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फोर्टिफाइड राइस को लेकर बड़ा विवाद एक हफ्ते में बदलीं टेंडर शर्तें, स्थानीय कंपनियां बाहर, सरकार पर 200 करोड़ अतिरिक्त खर्च का आरोप

📑 इस लेख मेंफोर्टिफाइड राइस टेंडर की शर्तें एक हफ्ते में बदली गईं, स्थानीय कंपनियां बाहर, सरकार पर 200 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च कराने का आरोप, रायपुर।क्या है…

📅 14 January 2026, 11:14 am अपडेट: 16 May 2026
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फोर्टिफाइड राइस टेंडर की शर्तें एक हफ्ते में बदली गईं, स्थानीय कंपनियां बाहर, सरकार पर 200 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च कराने का आरोप, रायपुर।

रायपुर। छत्तीसगढ़ में फोर्टिफाइड चावल (Fortified Rice) वितरण को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए टेंडर की शर्तों में सिर्फ एक सप्ताह के भीतर बदलाव कर दिए जाने से स्थानीय कंपनियां दौड़ से बाहर हो गई हैं। आरोप है कि बदली गई शर्तों के कारण अब चावल फोर्टिफिकेशन का काम बाहरी बड़ी कंपनियों को मिलेगा, जिससे सरकारी खजाने पर लगभग 200 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

इस पूरे मामले ने शासन की पारदर्शिता और नीति-निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


क्या है पूरा मामला?

राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी योजनाओं के तहत फोर्टिफाइड चावल सप्लाई के लिए खाद्य विभाग ने हाल ही में टेंडर जारी किया था। शुरुआती टेंडर शर्तों के अनुसार—

  • स्थानीय राइस मिलर्स और कंपनियां भी पात्र थीं
  • मशीन क्षमता और अनुभव की शर्तें व्यावहारिक थीं

लेकिन महज एक हफ्ते के भीतर टेंडर की शर्तों में बड़ा बदलाव कर दिया गया, जिससे—

  • अनुभव और टर्नओवर की सीमा बढ़ा दी गई
  • अत्याधुनिक मशीनों की अनिवार्यता जोड़ दी गई

इन नई शर्तों को पूरा करना स्थानीय कंपनियों के लिए लगभग असंभव हो गया।


स्थानीय कंपनियां हुईं बाहर

टेंडर शर्तों में बदलाव के बाद प्रदेश की अधिकांश स्थानीय फोर्टिफिकेशन यूनिट्स और राइस मिलर्स बाहर हो गए हैं। उद्योग संगठनों का कहना है कि—

“शर्तें इस तरह बदली गई हैं कि केवल चुनिंदा बड़ी बाहरी कंपनियां ही टेंडर में भाग ले सकें।”

इससे न सिर्फ स्थानीय उद्योग को झटका लगा है, बल्कि रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका है।


200 करोड़ ज्यादा खर्च होने का दावा

आरोप लगाया जा रहा है कि यदि टेंडर स्थानीय कंपनियों को दिया जाता, तो सरकार को यह काम कम लागत में मिल सकता था। लेकिन बदली गई शर्तों के कारण अब—

  • सप्लाई रेट बढ़ जाएंगे
  • ट्रांसपोर्टेशन और प्रोसेसिंग खर्च ज्यादा होगा

अनुमान है कि इससे सरकार को करीब 200 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे।


विपक्ष ने साधा निशाना

मामले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। नेताओं का कहना है कि—

  • टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं
  • कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए शर्तें बदली गईं
  • स्थानीय उद्योगों की अनदेखी की गई

विपक्ष ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।


सरकार की सफाई

खाद्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि—

“टेंडर शर्तों में बदलाव गुणवत्ता और पोषण मानकों को बेहतर बनाने के लिए किया गया है। फोर्टिफाइड राइस में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।”

हालांकि अधिकारियों ने 200 करोड़ के अतिरिक्त खर्च के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अंतिम लागत का आकलन टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किया जा सकता है।


विशेषज्ञों की राय

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि—

“फोर्टिफिकेशन जरूरी है, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में संतुलन होना चाहिए। गुणवत्ता के साथ-साथ स्थानीय उद्योग और लागत नियंत्रण भी जरूरी है।”


पहले भी उठते रहे हैं सवाल

यह पहला मौका नहीं है जब फोर्टिफाइड राइस को लेकर विवाद हुआ हो। इससे पहले भी—

  • चावल की गुणवत्ता
  • फोर्टिफिकेशन मशीनों की क्षमता
  • सप्लाई चेन में पारदर्शिता

जैसे मुद्दों पर सवाल उठ चुके हैं।


निष्कर्ष

फोर्टिफाइड राइस जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े विषय पर टेंडर शर्तों में अचानक बदलाव न केवल संदेह पैदा करता है, बल्कि इससे सरकार की मंशा और नीति पर भी सवाल खड़े होते हैं। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो यह विवाद और गहरा सकता है।

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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल

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