मरीज वार्ड में, दिखाया आईसीयू में: गड़बड़ी के बाद आयुष्मान के 280 करोड़ के दावे खारिज

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रायपुर में आयुष्मान योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर, मरीज वार्ड में लेकिन आईसीयू दिखाकर क्लेम, जांच के बाद 280 करोड़ रुपए के दावे खारिज किए गए।

रायपुर। राज्य में आयुष्मान योजना के तहत इलाज के नाम पर किए जा रहे फर्जी और संदिग्ध दावों पर बड़ी कार्रवाई सामने आई है। जांच में यह खुलासा हुआ है कि कई मामलों में मरीजों को सामान्य वार्ड में भर्ती किया गया, लेकिन दस्तावेजों में उन्हें आईसीयू में भर्ती दिखाकर भारी-भरकम बिल लगाए गए। इस गंभीर गड़बड़ी के बाद करीब 280 करोड़ रुपए के आयुष्मान क्लेम खारिज कर दिए गए हैं।

स्वास्थ्य विभाग और योजना से जुड़े अधिकारियों की संयुक्त जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ निजी अस्पतालों ने इलाज की वास्तविक स्थिति से अलग जानकारी पोर्टल पर अपलोड कर भुगतान लेने की कोशिश की।


कैसे सामने आया फर्जीवाड़ा

अधिकारियों के अनुसार, आयुष्मान योजना के अंतर्गत भेजे गए क्लेम की रैंडम ऑडिट और फिजिकल वेरिफिकेशन के दौरान कई मामलों में गड़बड़ी पाई गई। मरीजों से सीधे बातचीत, अस्पताल रजिस्टर और भर्ती पर्चियों के मिलान में यह साफ हुआ कि—

  • मरीज सामान्य वार्ड में भर्ती थे
  • दस्तावेजों में उन्हें आईसीयू मरीज बताया गया
  • महंगे पैकेज के तहत भुगतान की मांग की गई

इसी तरह के कई मामलों को मिलाकर लगभग 280 करोड़ रुपए के दावे संदेह के घेरे में आए।


अस्पतालों की भूमिका पर उठे सवाल

जांच टीम को यह भी पता चला है कि कुछ अस्पतालों ने इलाज की अवधि, प्रक्रियाओं और जांचों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। कई मामलों में—

  • इलाज की वास्तविक अवधि कम थी
  • रिपोर्ट में अधिक दिन भर्ती दर्शाया गया
  • अतिरिक्त प्रक्रियाएं जोड़ दी गईं

इस तरह सिस्टम का दुरुपयोग कर सरकारी राशि हड़पने का प्रयास किया गया।


क्यों आईसीयू दिखाकर बनाए गए क्लेम

आयुष्मान योजना के तहत आईसीयू पैकेज की राशि सामान्य वार्ड की तुलना में काफी अधिक होती है। इसी अंतर का फायदा उठाकर कुछ अस्पतालों ने मरीजों को आईसीयू में भर्ती बताए बिना ही महंगे पैकेज के क्लेम लगा दिए।

जांच अधिकारियों का कहना है कि यही वजह है कि सबसे ज्यादा गड़बड़ी आईसीयू पैकेज से जुड़े मामलों में पाई गई।


डिजिटल निगरानी से पकड़ा गया खेल

अब आयुष्मान पोर्टल पर अपलोड होने वाले मामलों की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स आधारित सिस्टम का उपयोग भी किया जा रहा है। इससे—

  • संदिग्ध पैटर्न
  • बार-बार एक जैसे क्लेम
  • असामान्य बिलिंग
  • कम समय में अधिक क्लेम

जैसी गतिविधियों को चिन्हित किया जा रहा है।

इसी तकनीकी निगरानी के आधार पर कई अस्पतालों के दावों को रोका गया और फिर विस्तृत जांच कर उन्हें खारिज किया गया।


आगे और अस्पतालों पर भी हो सकती है कार्रवाई

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल शुरुआत है। अभी और अस्पतालों के पुराने क्लेम की दोबारा जांच की जा रही है। जिन संस्थानों के खिलाफ लगातार शिकायतें और संदिग्ध बिलिंग सामने आ रही है, उनके—

  • पैनल से हटाए जाने
  • ब्लैकलिस्ट करने
  • कानूनी कार्रवाई

पर भी विचार किया जा रहा है।


मरीजों के नाम पर किया गया खेल

जांच में यह भी सामने आया है कि कई मरीजों को यह तक जानकारी नहीं थी कि उन्हें आईसीयू में भर्ती दिखाया गया है। कुछ मरीजों ने स्पष्ट रूप से बताया कि वे पूरे समय सामान्य वार्ड में ही रहे।

अधिकारियों के मुताबिक, मरीजों की जानकारी और सहमति के बिना इस तरह क्लेम बनाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।


सरकारी खजाने को नुकसान रोकने की कोशिश

राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य केवल फर्जीवाड़ा पकड़ना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आयुष्मान योजना की राशि सही जरूरतमंद मरीजों पर ही खर्च हो।

गलत क्लेम से न सिर्फ सरकारी धन का दुरुपयोग होता है, बल्कि असली मरीजों के इलाज पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।


अस्पतालों को जारी होंगे कारण बताओ नोटिस

सूत्रों के मुताबिक, जिन अस्पतालों के क्लेम खारिज किए गए हैं, उन्हें जल्द कारण बताओ नोटिस जारी किए जाएंगे। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर—

  • भुगतान पर स्थायी रोक
  • भविष्य के क्लेम पर निगरानी
  • और अनुबंध समाप्त करने

जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।


मरीजों से भी मांगी जा रही जानकारी

जांच एजेंसियां अब संबंधित मरीजों से भी संपर्क कर रही हैं ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि—

  • उन्हें कौन सा इलाज मिला
  • किस वार्ड में भर्ती रखा गया
  • कितने दिन अस्पताल में रहे

इन जानकारियों को अस्पतालों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों से मिलाया जा रहा है।


आयुष्मान योजना की विश्वसनीयता बनाए रखने की कोशिश

अधिकारियों का कहना है कि आयुष्मान योजना आम नागरिकों के लिए जीवन रेखा है। यदि कुछ संस्थान इसमें गड़बड़ी करेंगे, तो पूरे सिस्टम की साख पर असर पड़ता है। इसलिए अब राज्य स्तर पर क्लेम ऑडिट को और सख्त किया जा रहा है।

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