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युवा किसान ने धान छोड़ विकसित किया नवाचार मॉडल: रेतीली नहीं सामान्य जमीन पर तरबूज की खेती, ड्रिप-मल्चिंग और पॉलीहाउस तकनीक से बदली किस्मत

📑 इस लेख मेंरायपुर के युवा किसान ने धान छोड़ सामान्य जमीन पर ड्रिप, मल्चिंग और पॉलीहाउस तकनीक से तरबूज की खेती कर नवाचार मॉडल तैयार किया।धान छोड़…

📅 16 February 2026, 11:35 am अपडेट: 16 May 2026
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रायपुर के युवा किसान ने धान छोड़ सामान्य जमीन पर ड्रिप, मल्चिंग और पॉलीहाउस तकनीक से तरबूज की खेती कर नवाचार मॉडल तैयार किया।

रायपुर। राजधानी रायपुर जिले के एक युवा किसान ने पारंपरिक धान की खेती छोड़कर आधुनिक तकनीक आधारित तरबूज उत्पादन का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो अब क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। खास बात यह है कि तरबूज की यह खेती रेतीली जमीन पर नहीं, बल्कि सामान्य कृषि भूमि पर की जा रही है और उसमें ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और पॉलीहाउस तकनीक का प्रयोग किया गया है।

इस नवाचार से न केवल पानी और लागत की बचत हुई है, बल्कि उत्पादन और मुनाफे में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।


धान छोड़ तरबूज की ओर बढ़ाया कदम

किसान ने बताया कि हर साल धान की खेती में अधिक पानी, खाद और कीटनाशकों पर खर्च बढ़ता जा रहा था, जबकि बाजार भाव स्थिर रहने से लाभ सीमित हो रहा था। इसी वजह से उन्होंने परंपरागत फसल चक्र से हटकर व्यावसायिक सब्जी एवं फल उत्पादन की योजना बनाई।

कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने तरबूज की उन्नत किस्म का चयन किया और आधुनिक पद्धति से खेती शुरू की।


सामान्य जमीन पर सफल प्रयोग

आमतौर पर तरबूज की खेती रेतीली या हल्की भूमि में बेहतर मानी जाती है, लेकिन इस युवा किसान ने सामान्य खेत की मिट्टी में उचित बेड तैयार कर, जैविक खाद और संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग कर सफल उत्पादन किया।

खेत की मिट्टी की जांच कर पोषक तत्वों की कमी को पहले ही दूर किया गया, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर हुई।


ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत

खेती में ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाई गई, जिससे पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचता है। इससे—

  • पानी की खपत 40 से 50 प्रतिशत तक कम हुई
  • खरपतवार कम उगे
  • उर्वरकों का उपयोग नियंत्रित रहा
  • फसल में रोगों का प्रकोप घटा

किसान के अनुसार, पहले जहां धान में एक सीजन में भारी मात्रा में पानी लगता था, वहीं तरबूज में सीमित जल से ही बेहतर उत्पादन मिल रहा है।


मल्चिंग तकनीक से बढ़ी गुणवत्ता

पौधों की कतारों के बीच मल्चिंग शीट बिछाई गई, जिससे नमी लंबे समय तक बनी रही और मिट्टी का तापमान संतुलित रहा। इससे फल आकार में बड़े, चमकदार और गुणवत्तापूर्ण बने।

मल्चिंग से खेत में घास-फूस की समस्या भी काफी हद तक खत्म हो गई, जिससे श्रम लागत में भी कमी आई।


पॉलीहाउस से मिली शुरुआती बाजार में एंट्री

युवा किसान ने अपने खेत के एक हिस्से में पॉलीहाउस तकनीक का भी प्रयोग किया। इसके जरिए उन्होंने ऑफ-सीजन नर्सरी तैयार की और शुरुआती फसल ली।

इसका बड़ा फायदा यह हुआ कि बाजार में तरबूज जल्दी पहुंचा और उन्हें बेहतर भाव मिला। शुरुआती बिक्री से ही लागत का बड़ा हिस्सा निकल आया।


लागत कम, मुनाफा ज्यादा

किसान का कहना है कि धान की तुलना में तरबूज की इस तकनीकी खेती में प्रारंभिक निवेश थोड़ा अधिक जरूर था, लेकिन—

  • उत्पादन ज्यादा हुआ
  • गुणवत्ता बेहतर रही
  • बाजार में कीमत अच्छी मिली
  • फसल अवधि कम रही

परिणामस्वरूप शुद्ध मुनाफा धान की खेती से लगभग दोगुना तक पहुंच गया।


दूसरे किसानों के लिए बना मॉडल

इस नवाचार मॉडल को देखने के लिए आसपास के गांवों से किसान लगातार खेत का भ्रमण कर रहे हैं। कई किसानों ने अगली फसल में तरबूज, खरबूज और सब्जियों की आधुनिक खेती अपनाने की तैयारी शुरू कर दी है।

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह मॉडल दर्शाता है कि यदि तकनीक और वैज्ञानिक सलाह के साथ खेती की जाए तो सामान्य जमीन पर भी उच्च मूल्य वाली फसलों से बेहतर आमदनी संभव है।


जल संरक्षण और टिकाऊ खेती की मिसाल

यह प्रयोग केवल आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि का भी उदाहरण बन गया है। ड्रिप और मल्चिंग से पानी की भारी बचत हुई है और रासायनिक इनपुट का प्रयोग भी नियंत्रित रहा है।


भविष्य में और फसलों पर होगा प्रयोग

युवा किसान अब आने वाले सीजन में—

  • खरबूज
  • टमाटर
  • शिमला मिर्च

जैसी फसलों को भी इसी तकनीक से उगाने की योजना बना रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन और स्थायी आमदनी का मॉडल तैयार किया जाए।

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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल

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