पिछले 13 सालों से नहीं बढ़ी RTE की राशि: इसी अवधि में विधायक-कलेक्टर की सैलरी 255% तक बढ़ी, प्राइवेट स्कूल करेंगे असहयोग आंदोलन
📑 इस लेख मेंरायपुर में निजी स्कूलों ने आरटीई राशि 13 साल से न बढ़ने पर नाराजगी जताई, वेतन वृद्धि का हवाला देते हुए असहयोग आंदोलन की चेतावनी…
रायपुर में निजी स्कूलों ने आरटीई राशि 13 साल से न बढ़ने पर नाराजगी जताई, वेतन वृद्धि का हवाला देते हुए असहयोग आंदोलन की चेतावनी दी।
रायपुर। राजधानी रायपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में निजी स्कूल संचालकों ने आरटीई के तहत मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि (रीइम्बर्समेंट) को लेकर गंभीर नाराजगी जताई है। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि पिछले 13 वर्षों से आरटीई के तहत विद्यार्थियों पर मिलने वाली राशि में कोई वृद्धि नहीं की गई है, जबकि इसी अवधि में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन में 255 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।
निजी स्कूल संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने शीघ्र राशि में संशोधन नहीं किया तो राज्यभर में असहयोग आंदोलन शुरू किया जाएगा।
13 वर्षों से एक ही दर पर चल रहा भुगतान
निजी स्कूल प्रबंधन का कहना है कि आरटीई के अंतर्गत कमजोर और वंचित वर्ग के विद्यार्थियों को निजी स्कूलों में प्रवेश दिया जाता है और उसके बदले सरकार द्वारा प्रति छात्र प्रतिपूर्ति राशि दी जाती है।
लेकिन वर्ष 2012 के बाद से इस राशि में कोई वास्तविक बढ़ोतरी नहीं की गई है।
स्कूल संचालकों के अनुसार, बीते वर्षों में—
- शिक्षकों का वेतन बढ़ा
- बिजली, पानी और अन्य उपयोगी सेवाओं के शुल्क बढ़े
- भवन किराया और रखरखाव खर्च बढ़ा
- डिजिटल शिक्षा और संसाधनों पर अतिरिक्त खर्च आया
इसके बावजूद आरटीई की प्रतिपूर्ति राशि पुराने स्तर पर ही बनी हुई है।
विधायक और कलेक्टर की सैलरी में 255% तक बढ़ोतरी का हवाला
निजी स्कूल संगठनों ने अपने विरोध में यह तर्क भी दिया कि इसी 13 साल की अवधि में विधायकों और कलेक्टर जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन और भत्तों में कई बार संशोधन हुआ है, जिससे कुल वृद्धि लगभग 255 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
संगठनों का कहना है कि जब महंगाई के अनुरूप शासकीय वेतन बढ़ाए जा सकते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था को संभाल रहे निजी स्कूलों के लिए आरटीई की राशि क्यों नहीं बढ़ाई जा रही।
स्कूलों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव
निजी स्कूल प्रबंधन का कहना है कि आरटीई के तहत पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कई स्कूलों में 25 प्रतिशत तक होती है।
ऐसे में यदि सरकार की ओर से मिलने वाली राशि वास्तविक खर्च से कम रहती है, तो उसकी भरपाई स्कूलों को अपने संसाधनों से करनी पड़ती है।
स्कूल संचालकों का आरोप है कि—
- प्रतिपूर्ति राशि समय पर नहीं मिलती
- कई मामलों में भुगतान महीनों तक लंबित रहता है
- दस्तावेजी प्रक्रियाएं जटिल हैं
इससे छोटे और मध्यम स्तर के स्कूलों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है।
प्राइवेट स्कूल करेंगे असहयोग आंदोलन
निजी स्कूल संगठनों ने ऐलान किया है कि यदि जल्द ही आरटीई की राशि में संशोधन नहीं किया गया तो राज्यव्यापी असहयोग आंदोलन शुरू किया जाएगा।
प्रस्तावित आंदोलन के तहत—
- आरटीई से जुड़ी अतिरिक्त शासकीय गतिविधियों में सीमित सहयोग
- विभिन्न प्रशासनिक कार्यक्रमों में सांकेतिक बहिष्कार
- ज्ञापन और जनजागरूकता अभियान
जैसे कदम उठाए जाएंगे।
संगठनों ने स्पष्ट किया है कि आंदोलन का उद्देश्य विद्यार्थियों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि सरकार का ध्यान वास्तविक समस्याओं की ओर आकर्षित करना है।
सरकार से क्या है मांग
निजी स्कूल संगठनों की प्रमुख मांगें हैं—
- आरटीई प्रतिपूर्ति राशि को वर्तमान लागत के अनुसार संशोधित किया जाए।
- हर तीन वर्ष में राशि की समीक्षा और संशोधन की व्यवस्था हो।
- लंबित भुगतान का समयबद्ध निपटारा किया जाए।
- ऑनलाइन प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
शिक्षा व्यवस्था पर असर की आशंका
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी स्कूलों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती रही तो इसका सीधा असर आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों की गुणवत्ता वाली शिक्षा पर भी पड़ सकता है।
निजी स्कूलों का कहना है कि वे सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के अधिकार को सफल बनाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए वित्तीय सहयोग भी व्यवहारिक होना जरूरी है।
जल्द निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन होगा तेज
स्कूल संगठनों ने सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आने वाले दिनों में असहयोग आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
रायपुर में शीघ्र ही इस संबंध में सामूहिक बैठक कर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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