उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने शहडोल जिले में सीवर लाइन कार्य के दौरान हुई दुर्घटना व्यक्त किया शोक
भोपाल। मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने शहडोल जिले में सीवर लाइन की खुदाई के दौरान हुई एक हृदय-विदारक दुर्घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है।…

भोपाल। मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने शहडोल जिले में सीवर लाइन की खुदाई के दौरान हुई एक हृदय-विदारक दुर्घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है। दुर्घटना में मिट्टी धंसने के कारण दो श्रमिक — मुकेश बैगा और महिपाल बैगा — मलबे में दबकर अपनी जान गँवा बैठे।
उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने इस घटना को “अत्यंत हृदय विदारक” बताया। उन्होंने दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान देने तथा शोक संतप्त परिजनों को इस वज्र समान पीड़ा सहन करने की शक्ति प्रदान करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। उप मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि पीड़ित परिवारों को शीघ्र सहायता उपलब्ध कराई जाए।
शहडोल जिले की सामाजिक संरचना
शहडोल मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक आदिवासी बहुल जिला है। यहाँ की लगभग 47 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजातियों की है, जिसमें बैगा, गोंड, कोल और कोरकू समुदाय प्रमुख हैं। मृतक मुकेश और महिपाल बैगा भी बैगा आदिवासी समुदाय से थे, जिसे भारत सरकार ने “विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह” (PVTG) के रूप में चिह्नित किया है। बैगा समुदाय परंपरागत रूप से वन-आधारित जीविका पर निर्भर रहा है, लेकिन हाल के दशकों में आजीविका के लिए कई बैगा आदिवासी निर्माण कार्यों, खानों और दैनिक मजदूरी पर निर्भर हो गए हैं।
निर्माण स्थलों पर श्रमिक सुरक्षा का मुद्दा
सीवर लाइन की खुदाई के दौरान मिट्टी धंसने से मजदूरों की मौत भारत में एक आवर्ती त्रासदी है। इसका मुख्य कारण है निर्माण स्थलों पर बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन न होना — जैसे खुदाई के दौरान दीवारों को सहारा देने के लिए स्टील शीटिंग या लकड़ी की प्रॉप का उपयोग न करना, श्रमिकों को हेलमेट और सुरक्षा-बेल्ट उपलब्ध न कराना, और गहरी खुदाई से पहले मिट्टी की संरचना का सर्वेक्षण न करना।
केंद्रीय श्रम मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार 1.5 मीटर से अधिक गहरी खुदाई के लिए शोरिंग (मिट्टी को थामने वाली व्यवस्था) अनिवार्य है, परंतु अधिकांश छोटे ठेकेदार इन नियमों का पालन नहीं करते। ऐसे में मजदूरों की जान का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
मुआवजे और सरकारी सहायता का प्रश्न
जब किसी श्रमिक की कार्यस्थल पर मृत्यु हो जाती है, तो परिवार को कई प्रकार की सहायता का अधिकार होता है — कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), श्रमिक कल्याण बोर्ड, राज्य सरकार की मृत्यु सहायता योजना, और अनुसूचित जनजाति के मामले में आदिवासी कल्याण विभाग की विशेष सहायता। हालाँकि अधिकांश मामलों में पीड़ित परिवारों को इन योजनाओं की जानकारी ही नहीं होती, और न ही उन्हें इन योजनाओं तक पहुँचने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन मिलता है।
उप मुख्यमंत्री द्वारा जिला प्रशासन को त्वरित सहायता के निर्देश इसी अंतर को पाटने का प्रयास है। यह आवश्यक है कि स्थानीय प्रशासन तत्काल मुआवजा प्रक्रिया प्रारंभ करे और परिवारों को सभी पात्र योजनाओं का लाभ मिल सके।
विरात महानगर का विश्लेषण: सीवर लाइन की खुदाई के दौरान दो आदिवासी श्रमिकों की मौत एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत विफलता का संकेत है। शहरी और अर्ध-शहरी विकास परियोजनाओं में लगे ठेकेदारों की जवाबदेही तय करना और श्रमिक सुरक्षा मानकों का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करना समय की माँग है। राज्य सरकार से अपेक्षा है कि इस घटना की निष्पक्ष जाँच हो, संबंधित ठेकेदार पर कानूनी कार्रवाई हो, और शहडोल जैसे आदिवासी बहुल जिलों में निर्माण स्थलों पर श्रम विभाग की नियमित निरीक्षण व्यवस्था स्थापित की जाए। एक मजदूर की जान केवल मुआवजे से नहीं तौली जा सकती — आवश्यक यह है कि अगली ऐसी घटना न हो।
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स्रोत / और पढ़ें: भारत सरकार पोर्टल
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