ईरान परमाणु समझौता: ट्रंप ने ओबामा-युग की आलोचना की, नए समझौते में जल्दबाजी से इनकार
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित नए परमाणु समझौते पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने ओबामा प्रशासन के दौरान हुए समझौते को 'सबसे खराब' करार देते हुए वर्तमान वार्ताओं में सावधानी बरतने पर जोर दिया।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित नए परमाणु समझौते पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने ओबामा प्रशासन के दौरान हुए समझौते को 'सबसे खराब' करार देते हुए वर्तमान वार्ताओं में सावधानी बरतने पर जोर दिया।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक संभावित नए परमाणु समझौते को लेकर अपनी स्पष्ट राय व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि उनका प्रशासन इस मामले में कोई जल्दबाजी नहीं करेगा और पूरी सावधानी के साथ आगे बढ़ेगा। ट्रंप ने ओबामा प्रशासन के दौरान हुए ईरान परमाणु समझौते को ‘सबसे खराब सौदों में से एक’ करार देते हुए उसकी कड़ी आलोचना की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी तब तक पूरी ताकत से जारी रहेगी, जब तक कोई औपचारिक शांति समझौता हस्ताक्षरित और प्रमाणित नहीं हो जाता। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मध्य पूर्व में स्थिरता को लेकर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस विषय पर विस्तार से बात की। उन्होंने 2015 के ईरान परमाणु समझौते (जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना या JCPOA के नाम से जाना जाता है) को ‘हमारे देश द्वारा किए गए सबसे खराब सौदों में से एक’ बताया। उनका आरोप था कि ओबामा प्रशासन के ‘अनुभवीहीन’ अधिकारियों और त्रुटिपूर्ण ढांचे ने तेहरान को परमाणु हथियार विकसित करने का सीधा रास्ता दिखाया। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि उनके प्रशासन द्वारा ईरान के साथ की जा रही वर्तमान वार्ताएं “बिल्कुल विपरीत” हैं। उन्होंने बताया कि ये चर्चाएं “व्यवस्थित और रचनात्मक” तरीके से आगे बढ़ रही हैं, लेकिन उन्होंने अपने वार्ताकारों को जल्दबाजी न करने का निर्देश दिया है, क्योंकि उनका मानना है कि “समय हमारे पक्ष में है।” उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जब तक कोई समझौता नहीं हो जाता, तब तक नाकाबंदी जारी रहेगी।

ईरान परमाणु समझौता, जिसे JCPOA के नाम से जाना जाता है, जुलाई 2015 में ईरान और P5+1 देशों (संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी) के बीच संपन्न हुआ था। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सख्त और सत्यापन योग्य प्रतिबंध लगाना था, जिसके बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जानी थी। इस समझौते को अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने के एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा गया था। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में इस समझौते से अमेरिका को एकतरफा बाहर निकाल लिया था, यह कहते हुए कि यह समझौता ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकने में विफल रहा और इसकी शर्तें ईरान के पक्ष में थीं, खासकर बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को शामिल न करने के कारण।
ओबामा प्रशासन का मानना था कि JCPOA ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका था, क्योंकि यह ईरान के परमाणु सुविधाओं पर कड़ी निगरानी और निरीक्षण सुनिश्चित करता था। इसके विपरीत, ट्रंप प्रशासन ने “अधिकतम दबाव” की नीति अपनाई, जिसमें ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध फिर से लगाए गए, ताकि उसे एक नए और अधिक व्यापक समझौते के लिए मजबूर किया जा सके। इस नीति के परिणामस्वरूप ईरान ने भी समझौते की कुछ प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करना शुरू कर दिया, जिससे तनाव और बढ़ गया। मध्य पूर्व की भू-राजनीति में ईरान का महत्वपूर्ण स्थान है और उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंताएं इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती रही हैं, खासकर इजरायल और खाड़ी देशों के लिए।
ट्रंप के ये बयान मध्य पूर्व में कूटनीतिक गतिविधियों के बीच आए हैं, जहां वैश्विक हितधारक परमाणु चिंताओं और क्षेत्रीय स्थिरता को संबोधित करने वाले एक नए समझौते के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान के साथ अमेरिकी संबंध “अधिक पेशेवर और उत्पादक” होते जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह दोहराया कि तेहरान को परमाणु हथियार विकसित करने या प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने खाड़ी देशों को उनके सहयोग और समर्थन के लिए धन्यवाद दिया, और संकेत दिया कि अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords) में क्षेत्रीय भागीदारी को और बढ़ाया जा सकता है, यहां तक कि भविष्य में ईरान के भी इस ढांचे में शामिल होने की संभावना जताई। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए क्षेत्रीय गठबंधनों के माध्यम से स्थिरता प्राप्त करना चाहता है।
इससे पहले, ट्रंप ने शनिवार को ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में कहा था कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच एक समझौते को “काफी हद तक बातचीत के जरिए तय कर लिया गया है।” उन्होंने यह भी बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में शांति और स्थिरता से संबंधित प्रयासों के संबंध में कई देशों के नेताओं के साथ चर्चा में लगा हुआ है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से संबंधित मुद्दे भी शामिल हैं। इस बीच, ‘एक्सियोस’ ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से खबर दी है कि अमेरिका और ईरान के बीच 60-दिवसीय युद्धविराम के लिए समझौता ज्ञापन अपने अंतिम चरण में है, और वार्ताकार शेष अंतराल को भरने और क्षेत्र में आगे बढ़ने वाली वृद्धि को रोकने के लिए काम कर रहे हैं। ये संकेत दर्शाते हैं कि पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रगति हो रही है, भले ही सार्वजनिक बयान सावधानी भरे हों।
**विरात महानगर का विश्लेषण:** ईरान परमाणु समझौते पर डोनाल्ड ट्रंप का यह रुख मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन को दर्शाता है। उनका “जल्दबाजी नहीं” का सिद्धांत एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य ईरान पर अधिकतम दबाव बनाए रखना और उसे एक ऐसे समझौते के लिए मजबूर करना है जो अमेरिका के हितों के अनुरूप हो। भारत जैसे देश के लिए, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर करता है, इस क्षेत्र में स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। ईरान और अमेरिका के बीच किसी भी तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजारों और शिपिंग लेन पर पड़ता है, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर। आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप प्रशासन, यदि वह सत्ता में लौटता है, ओबामा-युग के सौदे की कमियों को दूर करते हुए एक ऐसा स्थायी समाधान ढूंढ पाता है जो ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सके और क्षेत्रीय शांति सुनिश्चित कर सके। भारतीय कूटनीति को इन बदलते समीकरणों पर बारीकी से नजर रखनी होगी ताकि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।
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