सक्षम योजना में 16 करोड़ की खरीदी को टुकड़ों में बांटने के आरोप से छत्तीसगढ़ में पारदर्शिता पर सवाल, जांच और कार्रवाई की मांग तेज हुई।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की ‘सक्षम योजना’ के तहत खरीदी में बड़े स्तर पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। करीब 16 करोड़ रुपए की खरीदी को 155 छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर किए जाने का मामला उजागर हुआ है, जिससे पारदर्शिता और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, विभाग द्वारा टीवी, आरओ (वॉटर प्यूरीफायर) और अन्य उपकरणों की खरीदी को इस तरह विभाजित किया गया कि प्रत्येक खरीदी की राशि सीमित दायरे में रहे और टेंडर प्रक्रिया से बचा जा सके। आमतौर पर बड़ी राशि की खरीदी के लिए खुली निविदा (टेंडर) प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मामले में उसे दरकिनार करने की कोशिश की गई।
नियमों को दरकिनार करने का आरोप
जानकारों का कहना है कि सरकारी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एक निश्चित राशि से अधिक के कार्यों के लिए ई-टेंडरिंग अनिवार्य होती है। लेकिन 16 करोड़ की कुल राशि को 155 हिस्सों में बांटने से यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से टाली गई।
इस तरह की कार्यप्रणाली को प्रशासनिक भाषा में “स्प्लिटिंग ऑफ टेंडर” कहा जाता है, जिसे नियमों के खिलाफ माना जाता है। इससे न केवल प्रतिस्पर्धा खत्म होती है, बल्कि भ्रष्टाचार की संभावना भी बढ़ जाती है।
मूली-गाजर की तरह खरीदी
मामले में यह भी सामने आया है कि उपकरणों की खरीदी इतनी तेजी और बड़े पैमाने पर की गई जैसे बाजार में सामान्य सब्जियों की खरीद होती है। टीवी और आरओ जैसी वस्तुओं की एक साथ बड़ी संख्या में खरीद ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती, तो बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत पर उपकरण उपलब्ध हो सकते थे।
जांच की मांग तेज
मामला सामने आने के बाद विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के उद्देश्य के साथ भी खिलवाड़ है।
सक्षम योजना का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि खरीदी में ही गड़बड़ी हो, तो इसका लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पाता।
विभाग की सफाई
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि सभी खरीदी नियमों के तहत की गई है और किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है। उनका तर्क है कि स्थानीय स्तर पर जरूरतों के अनुसार अलग-अलग खरीदी की गई, जिससे प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाया जा सके।
हालांकि, इस सफाई से विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग लगातार उठ रही है।
पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह मामला सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को फिर से उजागर करता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल वित्तीय नुकसान का मामला होगा, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचेगी।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए खरीद प्रक्रिया को और अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए, साथ ही स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा निगरानी सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, महिला एवं बाल विकास विभाग की सक्षम योजना में खरीदी को लेकर सामने आए ये आरोप प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जांच में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।

