रायपुर में रील और निर्माण कार्यों के नाम पर 50 साल पुराने 150 से अधिक पेड़ काटे गए, जबकि करीब 1500 और पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है।
रायपुर। राजधानी रायपुर में हरियाली पर एक बार फिर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया रील और रियल एस्टेट गतिविधियों से जुड़े विकास कार्यों के नाम पर 50 वर्ष से अधिक पुराने 150 से ज्यादा पेड़ों को पहले ही काटा जा चुका है, जबकि अब करीब 1500 और पेड़ों के कटने की आशंका जताई जा रही है। इस पूरे मामले ने शहर के पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस इलाके में यह कटाई हो रही है, वहां वर्षों से घना हरित क्षेत्र विकसित हो चुका था। इन पेड़ों से आसपास के मोहल्लों को प्राकृतिक ठंडक, स्वच्छ हवा और जैव विविधता का सहारा मिलता था। अब भारी मशीनों और निर्माण गतिविधियों के चलते हरियाली तेजी से खत्म होती जा रही है।
50 साल पुराने पेड़ों पर चली आरी
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक कई पेड़ ऐसे थे, जिनकी उम्र 40 से 50 साल से भी अधिक बताई जा रही है। इनमें नीम, पीपल, बरगद और अन्य छायादार प्रजातियां शामिल थीं।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि पेड़ों की कटाई से पहले न तो क्षेत्रवासियों से कोई राय ली गई और न ही सार्वजनिक सूचना के जरिए लोगों को इसकी जानकारी दी गई।
करीब 1500 पेड़ों पर मंडरा रहा खतरा
पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं का दावा है कि जिस परियोजना के तहत अभी कटाई की जा रही है, उसके अगले चरण में लगभग 1500 पेड़ों को और हटाया जाना प्रस्तावित है। यदि ऐसा होता है, तो यह क्षेत्र पूरी तरह कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो जाएगा।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कटाई केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जगहों पर व्यू प्वाइंट, सजावटी ढांचे और सोशल मीडिया शूटिंग स्पॉट जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए भी प्राकृतिक क्षेत्र को साफ किया जा रहा है।
“रील के लिए रियल उजाड़ा जा रहा है”
स्थानीय लोगों का कहना है कि आज के दौर में दिखावे और प्रचार के लिए बनाए जा रहे रील और डिजिटल कंटेंट के नाम पर असली प्रकृति को खत्म किया जा रहा है। उनका आरोप है कि हरियाली को हटाकर कृत्रिम सजावट, लाइटिंग और इवेंट जोन बनाए जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन पर सीधा असर पड़ रहा है।
बढ़ेगा तापमान, घटेगी हवा की गुणवत्ता
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से स्थानीय तापमान में वृद्धि, प्रदूषण में इजाफा और भूजल स्तर पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। रायपुर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में पहले ही हीट आइलैंड प्रभाव की समस्या बढ़ती जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने और बड़े पेड़ कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नए पौधे लगाकर तुरंत उसकी भरपाई संभव नहीं होती।
प्रशासन से मांगा गया जवाब
सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट किया जाए कि—
- पेड़ों की कटाई किस अनुमति के तहत की गई
- कितने पेड़ों को काटने की स्वीकृति दी गई
- बदले में कितने पौधे लगाए जाएंगे और कहां लगाए जाएंगे
इस संबंध में नागरिकों ने छत्तीसगढ़ वन विभाग और स्थानीय प्रशासन से औपचारिक जानकारी सार्वजनिक करने की मांग भी की है।
वैकल्पिक योजना पर क्यों नहीं हुआ विचार?
पर्यावरण समूहों का कहना है कि यदि विकास कार्य जरूरी था, तो उसके लिए ऐसा डिजाइन भी तैयार किया जा सकता था जिसमें पुराने पेड़ों को संरक्षित रखा जाता। कई शहरों में ग्रीन डेवलपमेंट मॉडल के तहत पेड़ों को बचाते हुए निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, लेकिन यहां सबसे आसान रास्ता अपनाकर सीधे कटाई कर दी गई।
नागरिकों में बढ़ता आक्रोश
आसपास के रहवासियों का कहना है कि वे जल्द ही इस मुद्दे पर सामूहिक विरोध और ज्ञापन सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि एक ओर सरकार और प्रशासन पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर हरियाली खत्म की जा रही है।
स्थानीय निवासी बताते हैं कि इसी क्षेत्र में बच्चे खेलते थे, बुजुर्ग सुबह-शाम टहलने आते थे और पक्षियों की कई प्रजातियां यहां देखी जाती थीं। अब वहां केवल मिट्टी, मलबा और मशीनें नजर आ रही हैं।
सिर्फ पौधारोपण से नहीं होगी भरपाई
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े और परिपक्व पेड़ों की जगह केवल छोटे पौधे लगाकर संतुलन नहीं बनाया जा सकता। एक 40-50 साल पुराना पेड़ जितनी ऑक्सीजन, छाया और जैव विविधता देता है, उसके बराबर पहुंचने में नए पौधों को कई दशक लग जाते हैं।
पर्यावरण संतुलन पर सीधा असर
रायपुर में लगातार हो रहे शहरीकरण के चलते पहले ही हरित क्षेत्र घटते जा रहे हैं। ऐसे में यदि हजारों पेड़ एक साथ हटाए जाएंगे, तो इसका असर आने वाले वर्षों में जल संकट, तापमान वृद्धि और स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आ सकता है।
रोक नहीं लगी तो होगा आंदोलन
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि प्रस्तावित 1500 पेड़ों की कटाई पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो वे प्रशासन के खिलाफ जन आंदोलन शुरू करेंगे। इसके लिए जिला प्रशासन और वन विभाग को ज्ञापन सौंपा जाएगा और कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जाएगा।
लोगों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास के नाम पर प्रकृति की बलि देना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय है।

