रायपुर में अतिक्रमण हटाने के पांच दिन बाद ही फिर सड़कों और फुटपाथों पर दुकानें सज गईं, जुर्माना और चेतावनी दोनों बेअसर साबित हुए।
रायपुर। शहर में अतिक्रमण हटाने को लेकर प्रशासनिक सख्ती के दावे एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। राजधानी रायपुर में जिन सड़कों और फुटपाथों से हाल ही में अवैध कब्जा हटाया गया था, वहां महज पांच दिनों के भीतर दोबारा दुकानें और ठेले सज गए। कार्रवाई के दौरान जुर्माना भी वसूला गया, चेतावनी भी दी गई, लेकिन नतीजा शून्य नजर आ रहा है।
नगर प्रशासन की यह कार्रवाई मुख्य रूप से नगर निगम रायपुर द्वारा की गई थी। उद्देश्य था—शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाना और आम नागरिकों को पैदल चलने के लिए सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध कराना। लेकिन जमीनी हालात यह बता रहे हैं कि कार्रवाई केवल अस्थायी साबित हो रही है।
जहां हटाया गया, वहीं फिर जम गया बाजार
शहर के कई प्रमुख मार्गों और चौक-चौराहों पर नगर निगम के अमले ने अतिक्रमण हटाकर सड़क और फुटपाथ खाली कराए थे। कार्रवाई के दौरान ठेले, अस्थायी दुकानों, टीन शेड और अवैध ढांचों को हटाया गया। कई व्यापारियों से नियमानुसार जुर्माना भी वसूला गया और दोबारा कब्जा न करने की सख्त हिदायत दी गई थी।
लेकिन पांच दिन भी नहीं बीते थे कि वही स्थान फिर से अस्थायी दुकानों और ठेलों से भर गए। स्थिति यह है कि जिन जगहों पर बुलडोजर और दस्ते नजर आए थे, वहीं दोबारा कारोबार शुरू हो चुका है।
चेतावनी भी बेअसर
नगर निगम अधिकारियों का कहना था कि बार-बार कब्जा करने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर नहीं दिख रहा। कई दुकानदारों का मानना है कि कुछ दिनों की सख्ती के बाद फिर से सब सामान्य हो जाएगा, इसलिए वे दोबारा वहीं कब्जा जमा लेते हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन केवल अभियान के समय सक्रिय रहता है, उसके बाद निगरानी लगभग खत्म हो जाती है। इसी का फायदा उठाकर अतिक्रमणकर्ता फिर से सड़कों पर उतर आते हैं।
ट्रैफिक और पैदल चलने वालों को हो रही परेशानी
शहर में बढ़ते अतिक्रमण का सीधा असर यातायात व्यवस्था पर पड़ रहा है। फुटपाथों पर दुकानें लगने से पैदल चलने वालों को मजबूरन सड़क पर उतरना पड़ता है। इससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ रही है।
कई इलाकों में दोपहिया और चारपहिया वाहनों को निकालने में परेशानी हो रही है। खासकर कार्यालय समय और शाम के व्यस्त घंटों में जाम की स्थिति बन जाती है।
जुर्माना वसूली तक सीमित कार्रवाई
नगर निगम की कार्रवाई को लेकर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या अतिक्रमण हटाने का अभियान केवल जुर्माना वसूली तक सीमित रह गया है? बार-बार वही दुकानदार और ठेले वाले अतिक्रमण करते हैं, जुर्माना भरते हैं और फिर उसी जगह दोबारा कब्जा कर लेते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि बार-बार नियम तोड़ने वालों के खिलाफ स्थायी कार्रवाई की जाए, जैसे—लाइसेंस रद्द करना, सामान जब्त करना या लंबे समय के लिए प्रतिबंध लगाना—तभी स्थिति में सुधार संभव है।
निगरानी तंत्र कमजोर
नगर निगम द्वारा अतिक्रमण हटाने के बाद उस स्थान पर स्थायी निगरानी की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं की जाती। न तो नियमित पेट्रोलिंग होती है और न ही क्षेत्रीय कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जाती है। परिणामस्वरूप अतिक्रमणकर्ता दो-तीन दिन रुककर फिर उसी स्थान पर लौट आते हैं।
कुछ स्थानों पर तो दुकानदारों ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि “दो-चार दिन का सवाल होता है, फिर सब पहले जैसा हो जाता है।”
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
शहर में बढ़ती आबादी, बेरोजगारी और फुटपाथ व्यापार की मजबूरी को देखते हुए यह समस्या और जटिल हो गई है। एक ओर प्रशासन पर सड़क और फुटपाथ खाली रखने का दबाव है, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों परिवार इन्हीं अस्थायी दुकानों पर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल हटाओ अभियान से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए वैकल्पिक वेंडिंग जोन, स्थायी बाजार क्षेत्र और पंजीकृत ठेला नीति को सख्ती से लागू करना जरूरी है।
आम लोगों में बढ़ रहा आक्रोश
स्थानीय रहवासियों का कहना है कि हर बार अभियान चलता है, फोटो खिंचती है, खबरें बनती हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। इससे आम जनता का प्रशासन पर भरोसा कमजोर हो रहा है।
लोगों का साफ कहना है कि यदि नगर निगम वास्तव में शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाना चाहता है, तो बार-बार कब्जा करने वालों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई करनी होगी, वरना अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

