छत्तीसगढ़ सरकार ने चरणपादुका योजना फिर शुरू की, 12.40 लाख वनवासियों को जूते-चप्पल का लाभ मिला, आदिवासी समाज को स्वास्थ्य और सुरक्षा में राहत।
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने वनवासियों और आदिवासी समुदाय के हित में एक बार फिर चरणपादुका योजना को शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत प्रदेश के 12 लाख 40 हजार से अधिक वनवासी परिवारों को जूते-चप्पल वितरित किए गए हैं। सरकार का यह कदम उन ग्रामीण और आदिवासी नागरिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिन्हें वर्षों से जंगलों और पथरीले रास्तों पर नंगे पांव चलने की मजबूरी झेलनी पड़ रही थी।
मुख्यमंत्री के निर्देश पर फिर से शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सम्मानजनक जीवन और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। वन विभाग और आदिवासी विकास विभाग के संयुक्त समन्वय से यह वितरण अभियान पूरे प्रदेश में तेज़ी से चलाया गया।
क्या है चरणपादुका योजना?
चरणपादुका योजना पहली बार वर्ष 2007 में शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य था —
- वनवासियों को जूते-चप्पल उपलब्ध कराना
- जंगल और पथरीले इलाकों में पैरों को चोट से बचाना
- स्वास्थ्य समस्याओं को कम करना
- सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने में मदद करना
बीते कुछ वर्षों में यह योजना बंद पड़ी थी, लेकिन अब इसे दोबारा शुरू कर आदिवासी समाज को बड़ी सौगात दी गई है।
12.40 लाख से ज्यादा लाभार्थी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस चरण में —
- 12.40 लाख से अधिक वनवासी लाभान्वित हुए
- हजारों गांवों और आश्रम क्षेत्रों में वितरण हुआ
- प्राथमिकता दूरस्थ और दुर्गम इलाकों को दी गई
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि विशेष शिविर लगाकर गांव-गांव में जूते-चप्पल पहुंचाए गए, ताकि किसी भी पात्र व्यक्ति को वंचित न रहना पड़े।
क्यों जरूरी थी यह योजना?
छत्तीसगढ़ के अधिकांश वन क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में लोग —
- नंगे पांव जंगलों में लकड़ी, तेंदूपत्ता और महुआ बीनने जाते हैं
- पहाड़ी और पथरीले रास्तों पर लंबी दूरी तय करते हैं
- सांप-बिच्छू, कांटे और संक्रमण का खतरा झेलते हैं
इन परिस्थितियों में चरणपादुका योजना उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पैरों में चोट लगने से संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जिसे यह योजना काफी हद तक कम कर सकती है।
मुख्यमंत्री का संदेश
मुख्यमंत्री ने इस योजना की शुरुआत करते हुए कहा —
“वनवासी और आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। उनका सम्मान, सुरक्षा और स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता है। चरणपादुका योजना के माध्यम से हम उनके जीवन को थोड़ा और सुरक्षित और सम्मानजनक बनाना चाहते हैं।”
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए।
महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को विशेष प्राथमिकता
इस अभियान में —
- महिलाओं के लिए अलग डिजाइन की चप्पलें
- बुजुर्गों के लिए आरामदायक सोल वाले जूते
- बच्चों के लिए हल्के और टिकाऊ फुटवियर
तैयार कर वितरित किए गए। आंगनबाड़ी केंद्रों और स्कूलों के माध्यम से बच्चों तक भी यह सुविधा पहुंचाई गई।
ग्रामीणों में खुशी की लहर
योजना शुरू होने के बाद वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में खुशी और संतोष का माहौल है। कई ग्रामीणों ने बताया कि पहली बार सरकार ने उनकी रोजमर्रा की तकलीफों को गंभीरता से समझा है।
बस्तर की एक महिला लाभार्थी ने कहा —
“अब जंगल में काम करने जाते समय पैरों में डर नहीं लगेगा। यह हमारे लिए बहुत बड़ी मदद है।”
रोजगार और स्थानीय उद्योग को भी बढ़ावा
सरकार ने इस योजना के तहत अधिकतर जूते-चप्पल स्थानीय स्वयं सहायता समूहों और लघु उद्योगों से बनवाए हैं। इससे —
- ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिला
- स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिला
- आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की दिशा में कदम बढ़ा
आगे और विस्तार की तैयारी
राज्य सरकार की योजना है कि —
- अगले चरण में और ज्यादा परिवारों को जोड़ा जाए
- स्कूल जाने वाले सभी आदिवासी बच्चों को कवर किया जाए
- विशेष जरूरत वाले लोगों के लिए अलग मॉडल तैयार किए जाएं
इसके लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान भी प्रस्तावित किया जा रहा है।
सामाजिक सरोकार की मिसाल
विशेषज्ञों का मानना है कि चरणपादुका योजना केवल जूते-चप्पल वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह —
- सामाजिक सम्मान का प्रतीक
- स्वास्थ्य सुरक्षा की पहल
- आदिवासी कल्याण की मजबूत कड़ी
बनकर उभरी है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चरणपादुका योजना को फिर से शुरू करना वनवासियों के जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव लाने वाला कदम माना जा रहा है। 12.40 लाख से अधिक लोगों तक इसका लाभ पहुंचना इस बात का संकेत है कि सरकार जमीनी स्तर पर आदिवासी समाज की समस्याओं को प्राथमिकता दे रही है। आने वाले समय में इस योजना के और व्यापक होने की उम्मीद जताई जा रही है।

